Wednesday, November 25, 2015



हस्तरेखा में मणिबंध रेखा का परिचय




मणिबन्ध

हाथ के मूल भाग में कलाई के ऊपरी भाग में मणिबन्ध होता है यह कई रेखाओं की सहायता से घुमावदार रेखा होती है।

मणिबन्ध में तीन बल होने से लम्बी आयु का पता चलता है तथा तीन से अधिक रेखायें होने से शुभ नहीं माना जाता है।

अ मणिबन्ध में अनेक खण्ड होने से व्यक्ति कंजूस होता है तथा समाज में सामान्य श्रेणी की स्थिति होती है।

ब मणिबन्ध एक रेखा की हो तो अल्पायु सम-हजयना
चाहिए।


स-  मणिबन्ध की प्रथम रेखा वलयकार और छोटे द्वीप हों तो व्यक्ति अपने पराक्रम से सफल होता है।

अ- तीन रेखाओं का मणिबन्ध हो तथा उसमें त्रिभुज हो तो बृद्धावस्था में परायी सम्पत्ति या धन मिलता है।

ब- पहला मणिबन्ध हथेली में ऊपर की ओर धनुषाÑति हो जाय तो संतान प्रतिबन्धक योग बनता है।

स- जंजीरनुमा होने से व्यक्ति मेहनती होता है।

अ- मणिबन्ध से कोई रेखा चन्दz पर्वत की ओर जाये तो व्यक्ति नौसेना या हवाई सेना में जाने का इच्छुक होता है।

ब- मणिबन्ध रक्त वर्ण की हो तथा जंजीरनुमा होने से व्यक्ति वाचाल होता है तथा आर्थिक हानि होती है।
स- मणिबन्ध अधूरी हो तथा कुछ रेखायें टूटकर शुक्र पर्वत पर जाये तो आजीविका में कुछ कठिनाई होती है।

अ- दो मणिबन्ध चौड़े और मोटे हों तो व्यक्ति को परिवार की चिंता रहती है तथा स्थान बदलने से पैसा कमा सकता है। ऐसे व्यक्ति अच्छी आय करते हैं पर स्वयं के पास कुछ नहीं होता।

ब- तीन मणिबन्ध कहीं से भी टूटे हुए न हों तो व्यक्ति किसी तकनीकी ज्ञान में दक्ष होता है। इनमें कुछ जल्दबाजी एवं दूसरे की भलाई की भावना होती है। 

स- मणिबन्ध से आयु रेखा को काटने वाली रेखा जन्म स्थान से दूर मृत्यु कराती है।

अ- मणिबन्ध की कोई रेखा बुध पर्वत तक जाने से अनायास धन प्राप्ति होती है।

ब-  मणिबन्ध से निकल कर कोई रेखा सूर्य स्थान तक जाने से व्यक्ति को दूसरे की मदद से
लक्ष्मी प्राप्त होती है तथा सुखी रहता है।



सौजन्य  - सरल हस्तरेखा पुस्तक 

Hastrekha Vigyan Aur Kartal



हस्तरेखा में दुर्घटना रेखा का परिचय



दुर्घटनायें


  •  शनि तथा मंगल पर्वत पर तारक चिह्न चन्द्र पर्वत के मध्य में एक रेखा
  • हाथ के सिरे की ओर आती हुई-ंउचयपशुओं से दुर्घटना।
  •  निकृष्ट हाथ में शुक्र पर्वत के निचले भाग पर रेखा के पास वर्ग-ंउचयकारावास
  • की सूचक।
  •  लहरदार, नीचे को -हजयुकती हुई मस्तिष्क रेखा साथ में त्रिकोण के पास
  • क्रास-ंउचयघातक दुर्घटना।
  •  मस्तिष्क रेखा और त्रिकोण पर क्रास-ंउचयअति गम्भीर दुर्घटना।
  •  मस्तिष्क रेखा शनि पर्वत के नीचे टूटी हुई, साथ में रेखा पर लाल
  • धब्बे-ंउचयसिर पर चोट।
  •  शुक्र पर्वत से एक रेखा शनि पर्वत को यदि उस रेखा की शाखायें हो
  • तो यह घातक सिद्ध होगी। मस्तिष्क रेखा सूर्य पर्वत के नीचे टूटी हुई-ंउचय
  • चैपाओं (चार पैर वाले जानवर) से दुर्घटना।



सौजन्य  - सरल हस्तरेखा पुस्तक 

Hastrekha Vigyan Aur Accident - Hastrekha Shastra Aur Durghatana



हस्तरेखा में मंगल रेखा का परिचय



मंगल रेखा


हस्त रेखा शास्त्र में मंगल ग्रह सूक्ष्म एवं आतंकपूर्ण है, इसका महत्व भाग्य
रेखा एवं सूर्य रेखा से कम नहीं हैं। जीवन रेखा टूटने या भंग होने पर
व्यक्ति को मंगल रेखा ही खतरों से बचाती है।

मंगल का स्थान हृदय और मस्तिष्क रेखा की सीमा रेखाओं से वेष्टित है।
यहां कोमल मांसल गद्दी के समान उभरा हुआ होता है। यदि यह क्षेत्र
पूर्णतः विकसित होता है तो व्यक्ति मेधावी, बौद्धिक, शक्ति सम्पन्न, निर्भीक
एवं ज्योतिष आदि विषयों में रुचि वाला, तर्क, कानून, न्याय का पुजारी
होता है। यदि मंगल के साथ अन्य समान्तर रेखाएं हों तो व्यक्ति सौभाग्यशाली होता है। यही रेखा शुक्र क्षेत्र की ओर -हजयुकी होने पर व्यक्ति के अन्दर तामसिक प्रवृत्त उत्पन्न करती है। यह क्षेत्र अवनत, दोषी अविकसित होने पर व्यक्ति को विधर्मी, पापकर्मी, राजदण्डभोगी और मर्यादाहीन बनाता है।

यही रेखा हृदय में स्फूर्ति शरीर में शक्ति और ओज का संचार करती है।
तथा आन्तरिक क्षमता और जीवन प्रदान करती है।

मंगल के साथ भी समान्तर रेखायें बलिष्ठ और लम्बी हों तो व्यक्ति को
कामी और शराबी बना देती है और वह अपनी आदम शक्ति का दुरुपयोग
करने लग जाता है। इस स्थिति में मंगल मंगलकारी नहीं रह जाता। अपनी
क्रूरता और उग्रता के कारण मंगल-ंउचयगुरु और शुक्र के सद्गुणों से भी
प्रभावित नहीं होता।



सौजन्य  - सरल हस्तरेखा पुस्तक 

Hastrekha Vigyan Aur Mangal Rekha



हस्तरेखा में संतान रेखा का परिचय



संतान रेखा




संतान रेखायें वे होती है जो विवाह रेखा के अन्त में उसके उपरी भाग में ऊपर की ओर जाती है। विवाह रेखा पर खड़ी और सीधी रेखा स्वस्थ पुत्र और टे-सजय़ी मे-सजय़ी कमजोर रेखा पुत्री का संकेत देती है। योगी, साधु सन्यासी, मठाधीश और शती लोगों के हाथ में विवाह और संतान रेखा के स्थान पर शिष्यों और पूज्य को क्रमशः माना जाता है।

संतान के सम्बन्ध में विचार करते समय हाथ के अन्य भागों की परीक्षा भी आवश्यक है। कभी-ंउचय2 यह रेखा इतनी सूक्ष्म होती है कि इसके परीक्षण के लिए मैग्नीफाइंग कांच की मदद लेनी पड़ती है।

इस सम्बन्ध में कुछ और बातें ध्यान रखने योग्य हैं। जैसे-ंउचय2

  •  रेखा के पतले भाग में द्वीप हो तो संतान आरम्भ में निर्बल होगी बाद में
  • यही रेखा स्पष्ट होगी तो स्वस्थ्य हो जायेगें।

  •  यदि रेखा के अन्त में द्वीप चिह्न हो तो बच्चा जीवित नहीं रहता।
  •  यदि संतान रेखा उतनी ही स्पष्ट हो जितनी कि उसके पत्नी की है तो
  • जातक बच्चों को बहुत प्यार करता है और उसका स्वभाव बहुत ही स्नेही
  • होता है।
  •  यदि हृदय रेखा बुध क्षेत्र पर दो या तीन रेखाओं में विभाजित होकर
  • शाखा स्पष्ट होवे तो वह व्यक्ति संतान युक्त होता है।





सौजन्य  - सरल हस्तरेखा पुस्तक 

Hastrekha Vigyan Aur Baccho Ki Rekha - Hastrekha Shastra Kids Line



हस्तरेखा में भाग्य रेखा का परिचय



भाग्य  रेखा 




वर्तमान समय के जन मानस में भाग्य शब्द अपरिचित नहीं हंै। आज अगर कोई कार्य समय पर नहीं हो पाता या उसमें किसी भी प्रकार की अड़चन आती है तो भाग्य को ही दोष दिया जाता है ।

गीता के अठारहवें अध्याय में कहा गया है कि भगवान श्री कृष्ण का सारा परिश्रम भाग्य के नीचे दब गया और उसमें लिखा है कि ”दैवंचैवात्र पंचमम्“। वास्तव में देखा जाय तो भाग्य एक बाजार है जहां थोड़ी देर ठहरने के बाद भाव गिर जाते हैं।

बालक अपने पूर्व जन्म के संस्कारों के आधार पर जिस परिवार में जन्म लेता है उसका परिवेश परिजन बड़ी तन्मयता से पालन करता है। इस जीवन में जो कुछ मनुष्य कर्म करता है। वह धीरे धीरे संचय होता जाता
है और उसकी एक तलपट तैयार होती जाती है, हम उसे कलान्तर में भाग्य का रुप दे देते हैं। आज का जो हमारा पुरुषार्थ है वही कल का भाग्य है, वास्तव में कर्मफल भोग के परिपाक को ही भाग्य कहते हैं।

मातृ दोषेण दुःशीलो, पितृ दोषेण मूर्खता।
कार्पण्य वंश दोषेण, स्वदोषेण दरिद्रता।।

(श्रीमद्भागवत महापुराण)
मनुष्य यदि चरित्रहीन हो तो उसकी माता में दोष सम-हजयना चाहिए, यदि वह मूर्ख है तो उसके पिता का दोष सम-हजयना चाहिए, यदि वह गरीब है तो किसी का दोष नहीं स्वयं का दोष सम-हजयना चहिए। इन्ही दस अंगुलियों द्वारा किये गये काम से दैनिक सप्ताहिक मासिक या वार्षिक रुप से भाग्य का संचय होता है। शनि रेखा या भाग्य रेखा मनुष्य का जीवन चक्र बतलाती है। उसका कारबार, व्यक्तित्व, आर्थिक उन्नति, परिवर्तन, व्याप्त प्रवृतियां इन सब का चित्रण भाग्य रेखा या शनि रेखा करती है।

भाग्य रेखा का उद्गम स्थान मणिबन्ध है, वहां से निकलने वाली रेखा मध्यमा अंगुली की ओर जाती है। इस रेखा के मार्ग में आने वाले अनेक चिह्न एवं रेखाओं का भिन्न-ंउचयभिन्न अर्थ निकलते हैं।

1.अ. भाग्य रेखा आयु रेखा में से निकलकर शनि पर्वत को जाये तो व्यक्ति का शुरुआती जीवन कुछ कठिनाई युक्त व्यतीत होता है। मेहनत से कार्य करके ये लोग प्रायः 21 वर्ष की आयु के पश्चात उन्नति करते हैं।

1.ब. भाग्य रेखा के शुरुआत में अगर यव का निशान होवे तो उसका जन्म रहस्मय बताया गया है, इन लोगों को बाल्यकाल में काफी कुछ खोना पड़ सकता है।

1.स. मणिबन्ध से प्रारम होनेवाली भाग्य रेखा शुभ मानी जाती है। आरम्भ में यदि मत्स्य रेखा हो तो अत्यन्त शुभ माना जाता है। यही रेखा चैकोर हाथ में होने से व्यक्ति काफी अधिक धन कमाता है तथा काम से जी नहीं चुराता है। यही रेखा दार्शनिक हाथ में होने से कम काम करने से अधिक पैसा प्राप्त होता है।

2.अ. मस्तिष्क रेखा से भाग्य रेखा शुरु होने पर काफी परेशानी को -हजयेलने के बाद व्यक्ति का कार्य प्रगति पथ की ओर अग्रसर होता पाया गया है।

2.ब. यदि भाग्य रेखा शनि पर्वत तक जाती है तो व्यक्ति की बृद्धावस्था सुखमय व्यतीत होती है।

2.स. भाग्य रेखा के समाप्ति स्थान पर क्रास का चिह्न घातक संकेत है।

3.अ. चन्द्र क्षेत्र से निकलने वाली भाग्य रेखा से दूसरों की सहायता या प्रोत्साहन से सफलता प्राप्त होती है राजनीतिज्ञ एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के हाथों में ऐसी रेखा अधिकांश पायी जाती है।

3.ब. सीधी जाती हुई भाग्य रेखा में चन्द्र क्षेत्र से आकर अन्य रेखा मिलने पर व्यक्ति इच्छानुसार सफल होगा परन्तु किसी की सहायता से।

3.स. यही रेखा स्त्रियों के हाथ में होने से उसका विवाह या तो धनवान से होगा या फिर किसी द्वारा धन की सहायता प्राप्त होगी।

4.अ. यदि भाग्य रेखा वृहस्पति क्षेत्र में पहुंच जाये तो व्यक्ति को अधिकार और विशिष्टता प्राप्त होती है ऐसे लोग उच्च पदों को प्राप्त करते हैं। इसके अलावा अगर अन्य शुभ लक्षण हों तथा रेखा के अन्त में त्रिशूल का आकार होवे तो यह राज योग होता है।

4.ब. यदि भाग्य रेखा की कोई शाखा वृहस्पति क्षेत्र में पहंुच जाये तो अति उत्तम योग होता है तथा ऐसे व्यक्ति अत्यंत महत्वाकांक्षी होते हैं।

4.स. शनि क्षेत्र में पहुंचने वाली भाग्य रेखा अच्छा फल देती है।

5.अ. जंजीरनुमा भाग्य रेखा व्यक्ति को दुःख में डाल देती हैं

5.ब. दो भाग्य रेखा हो तथा उसमें कोई दोष न हो तो व्यक्ति उन्नति करता है, सम्मान प्राप्त करता है, यह रेखा समानांन्तर होगी तो भी शुभ फल प्रदान करेगी।

5.स. यदि भाग्य रेखा हाथ को पार करके मध्यमा में पहुंच जाये तो लक्षण शुभ नहीं होता, वह व्यक्ति हमेशा सीमा और नियम कायदे का उल्लंघन करता है।
6.अ. यदि भाग्य रेखा शीर्ष रेखा पर ही रूकती हो तथा पुनः वहां से वृहस्पति क्षेत्र में पहुंचती हो तो व्यक्ति को प्रेम भावना के कारण बाधा उत्पन्न होती है। परन्तु गुरु के प्रभाव से पुनः प्रेम सम्बन्ध से सहायता द्वारा अभिलाषा पूर्ण होती है।

6.ब. शीर्ष रेखा द्वारा भाग्य रेखा रुक जाय तो व्यक्ति को स्वयं की गलती से असफलता मिलती है।

6.स. मंगल पर्वत से भाग्य रेखा शुरु होने पर भ्रम, शंका आदि का डर रहता है। यही रेखा शनि क्षेत्र पर जाने से बाधाओं में सफलता तथा धैर्य, श्रम, और लगन से उन्नति होती है।

7.अ. शुक्र पर्वत की ओर से आकर कई बारीक रेखायें जब भाग्य रेखा को काटती हैं, तो पारिवारिक कष्ट और उल-हजयनों का सामना करना पड़ता है।

7.ब. भाग्य रेखा मध्य में खण्डित होने से या टूट जाने से कुछ समय के लिए जीवन निष्क्रिय हो जाता है।

7.स. भाग्य रेखा से हृदय रेखा की ओर जाने वाली छोटी रेखायें हो तो व्यक्ति के जीवन में प्रेम का ऐसा भी क्षण आता है कि जिनका अन्त विवाह बाद भी नहीं होता।

8.अ. त्रिकोण से (दोनों हाथों में) शुरु होने वाली भाग्य रेखा व्यक्ति को बौद्धिक योजनाओं में सफलता प्रदान करती है।

8.ब. भाग्य रेखा के शुरुआत में टे-सजय़ी-ंउचयमे-सजय़ी रेखा एवं श्रृंखला व्यक्ति के बचपन में कष्ट का संकेत देती है।

8.स. भाग्य रेखा मध्य में हल्की पड़ जाने से उसके मध्य जीवनकाल में सुखमय समय का प्रतीक है।

9.अ. दोनों हाथों में बुध पर्वत पर जानेवाली भाग्य रेखा व्यापार में सफलता देती है।

9.ब. शुक्र पर्वत से एक गहरी रेखा भाग्य रेखा की ओर जाये तो व्यक्ति हिंसात्मक काम भावना वाला होता है।

9.स. यदि इसी रेखा के साथ अन्य रेखा भी जाती हो तो भारी बाधाओं पर आनन्दपूर्ण विजय होती है।

10.अ. भाग्य रेखा पर नीचे की ओर जाने वाली शाखायें व्यक्ति को आर्थिक कष्ट देती है।

10.ब. भाग्य रेखा तीन जगह से बीच में टूटने से वात रोग द्वारा कष्ट होता है।

10.स. अगर भाग्य रेखा को कोई अन्य शाखा काटती हुई बुध की जाली को पार कर जाये तो व्यक्ति की बेईमानी उसे ले डूबती है तथा उसे पश्चाताप करना होता है।

11.अ. चन्द्र क्षेत्र से सूर्य या बुध क्षेत्र को सीधी जाने वाली भाग्य रेखा व्यक्ति को व्यापार से महान सफलता दिलाती है। ऐसे लोगों को साहित्य और कला में भी सफलता मिलती है।

11.ब. मष्तिष्क रेखा से शुरु होने वाली भाग्य रेखा का व्यक्ति शराब या नशीले पदार्थों की दुकान आदि चलाता है।

11.स. जिन हाथों में भाग्य रेखा नहीं पायी जाती वे जीवन में सफल तो होते हैं पर उनमें विशेष निखार या तेज नहीं पाया जाता है। ऐसे लोगों को सामान्य सुखी कहा जा सकता है।



सौजन्य  - सरल हस्तरेखा पुस्तक 

Hastrekha Vigyan Aur Fate Line



हस्तरेखा में जीवन रेखा का परिचय



जीवन या आयु रेखा




हस्त रेखा पद्धति में अंगूठे के तीसरे पोर को घेरने वाली रेखा आयु रेखा
कहलाती है। अगर यह रेखा दोनों हाथों में स्पष्ट रूप से गोलायी युक्त हो
तो आयु का निश्चित प्रमाण भली प्रकार आंका जा सकता है। यहां एक
प्रश्न बड़ा रोचक सामने आता है कि जीव के साथ कर्म भी बुरी तरह
चिपका होता है । ऐसी स्थिति में भाग्य को कैसे जाना जाय तो यह जानना
भी आवश्यक हो जाता है कि कर्म भी दो प्रकार के होते हैं, निवार्य और
अनिवार्य यानी जिसका निवारण हो सके और दूसरा जो जरुरी है।
जैसे-ंउचय कभी-ंउचय2 किसी हाथ में संतान रेखा नहीं होने से यह स्पष्ट है कि
उसके भाग्य में संतान नहीं है परन्तु उससे सम्बन्धी निवार्य कर्म करने से
यानी किसी प्रकार का अनुष्ठान, उपाय आदि करने से उसे पुत्र या पुत्री
की प्राप्ति होती है।

भारतीय शास्त्रों और धर्म ग्रंथों में इसके अनेक प्रमाण पाये गये हैं। जैसे
महाराजा दशरथ का तीन विवाह हुआ। परन्तु संतान न होने से वे उसका
निवार्य कर्म किये जिसका नाम पुत्रेष्टि यज्ञ था। भारतीय दर्शन कर्म को
प्रधान मानता है, कर्म करना और आगे प्रगति करना मनुष्य का लक्ष्य है,
इसमें हस्तरेखा अत्यन्त सहायक है।

भारतीय पौर्वात्य पद्धति में इस आयु रेखा को पितृ रेखा भी कहते हैं। यह
11 प्रकार की मानी गयी हैः-ंउचय गज रेखा, सगू-सजय़ देहा, विगू-सजय़ देहा, परगू-सजय़
देहा, निगू-सजय़ देहा, अतिलक्ष्मी सुख भोग दात्री, कुबुद्धिकारी, सर्वसौख्य
विनाशिनी तथा गौरी,, रमा। मनुष्य अपने आयु काल में ही भौतिक सुखों
दुखों का भोग करता है। आयु ही मनुष्य का जीवन है। अतः आयु रेखा

ही हस्त रेखाओं में प्रधान रेखा है।


बीसवीं सताब्दी में संसार में सबसे अधिक आयु वाला यूक्रेन प्रान्त है (काला
सागर के उपर) भारत में मध्य प्रदेश और असम के व्यक्ति की आयु रेखा
काफी लम्बी होती है इसी कारण वे दीर्घ जीवी होते हैं।

आयु रेखा जितनी स्पष्ट एवं गोलायी में होगी, वह व्यक्ति असाधारण रूप
से महत्वाकांक्षी कार्य कुशल और यश को प्राप्त करने वाला होता है। वह
व्यक्ति किस कार्य में सफलता प्राप्त करेगा यह निर्णय पर्वत की प्रधानता
से किया जाता है।

जीवन रेखा शुक्र क्षेत्र को सीमित करेगी, तो व्यक्ति में सहानुभूति, वासना,
यौन इच्छाओं की कमी पायी जाती है। जीवन रेखा की लम्बाई कम होने
से व्यक्ति अल्पायु होता है अर्थात जीवन रेखा द्वारा जितनी अधिक सीमा
बनेगी, उस व्यक्ति में उतना ही शुक्रीय गुण अधिक होगा। यदि जीवन रेखा
कटी फटी या टूटी हुई हो तो मानसिक तौर पर अस्वस्थ बनाती है तथा
सदा रुग्ण एवं चिड़चिड़ा स्वभाव युक्त रहता है। समान्यतः वही रेखायें
प्रकट होती हैं, जिनका मानव शरीर पर प्रभाव होता है।

व्यक्ति के जीवन में योग क्रिया या विशेष परिस्थिति द्वारा परिवर्तन होने पर
रेखायें अपना नया मार्ग चुन लेती है। ऐसी स्थिति में यह भी प्रश्न उठ
सकता है कि उस हालत में भविष्यवाणी किस प्रकार की जाय? इसके
उत्तर में यह परिवर्तन दाहिने हाथ में ही होता है। घटनाओं का संकेत
बायें हाथ एवं पर्वतों से मिल सकता है।

सम्पूर्ण जीवन का लेखा जोखा इस आयु रेखा से ही होता है, समय या
काल उस रेखा या नक्से का अंग नहीं है। जीवन का घटना चक्र इतना
विस्तृत है कि उसमें हमारी हजारों यात्रायें उसी अकेली रेखा के थोड़े से
भाग में समायी हुई है।












1. आयु रेखा और मष्तिष्क रेखा दोनों एक
स्थान पर प्रारम्भ में मिलती हैं, तो व्यक्ति
अपनी शक्ति और उत्साह से कार्य में प्रगति
करेगा, वह सतर्क तो रहेगा, पर थोड़ी सी
संवेदनशीलता भी होगी।





2.यदि आयु रेखा और मष्तिष्क रेखा में शुरु
के स्थान परस्पर दूरी होगी, तो
व्यक्ति में जरुरत से ज्यादा आत्म विश्वास
एवं किसी भी विषय पर बोलने की क्षमता
होती है। (दूरी का अर्थ है कि एक इंच का
पांचवा या छठां भाग) ऐसी हालात में व्यक्ति
दूसरों की कम सुनता है और स्वतंत्र विचार
धारा का होता है और प्रायः नौकरी करने में
असफल रहता हैं।







3. जीवन रेखा बृहस्पति क्षेत्र से शुरु होने पर
व्यक्ति बचपन से ही महत्वाकांक्षी होता है।
जीवन रेखा, हृदयरेखा, शीर्ष रेखा का एक
साथ जुड़ा होना अत्यन्त दुर्भाग्य का सूचक
है, वह इस बात की सूचना देता है कि
बुद्धिहीनता या आवेश के कारण महा विपत्ति
में डालेगा।








4.जीवन रेखा जब मध्य में विभाजित होकर
उसकी शाखा चन्द्र क्षेत्र के मूल स्थान को
जाती है तो एक अच्छी बनावट के दृ-सजय़ हाथ
का व्यक्ति अस्थिर होता है। उसे यात्रायें
ज्यादा पसंद आती है। अगर मुलायम हाथ
हो शीर्ष रेखा -हजयुकी हो, तो व्यक्ति उत्तेजनापूर्ण
अवसरों के लिए लालायित रहता है, और
इस प्रकार की उत्तेजना किसी दुष्कर्म या
शराब पीने से शान्त होती हैं









5. जो रेखाएं जीवन रेखा से निकल कर
ऊपर की ओर जाती है, वे अधिकारों में वृद्धि,
आर्थिक लाभ और सफलता की सूचक होती
हैं।












6. अगर ऊपर की ओर जाती हुई रेखा
जीवन रेखा से निकल कर सूर्य क्षेत्र की ओर
जाये तो व्यक्ति में कुछ विशेष गुण पाये जाते
हैं।














7. उपर्युक्त रेखा अगर बुध क्षेत्र की ओर जाये
तो व्यापार और विज्ञान के क्षेत्र में सफलता
प्राप्त होती है।













8. अगर जीवन रेखा अंत में दो
शाखाओं में बंट जाय और दोनों शाखाओं
के बीच की दूरी अधिक हो तो व्यक्ति की मृत्यु अपने
जन्म स्थान से अन्य क्षेत्र में होती है।













9. यदि जीवन रेखा के आरम्भ में द्वीप का
चिह्न हो तथा वह बीमारी हालात के पश्चात
भी बना रहे, तो उस व्यक्ति का जन्म रहस्यपूर्ण
होता है।










10. जीवन रेखा पर वर्ग
अत्यन्त शुभ और सुरक्षा का
लक्षण माना जाता है। जीवन रेखा के अनुकूल दिशा में
सीधी रेखाएं शुभ और आड़ी-ंउचयतिरछी व काटती
हुई रेखाएं अशुभ मानी जाती है।











11. यदि कोई रेखा मंगल पर्वत से ऊपर
उठती हुई नीचे आकर जीवन रेखा को काटती
है या स्पर्श करती है तो ऐसी रेखा वाली स्त्री
का पहले किसी व्यक्ति के साथ अनुचित
सम्बन्ध रहा था, जो उसके लिए संकट का
कारण रहा था।














12. यदि जीवन रेखा के
भीतर की ओर छोटी रेखा समान्तर में साथ चलती है, तो
स्त्री के जीवन में आने वाला पुरुष नम्र प्रकृति का होगा।










13. आयु रेखा अगर अंगूठे की जड़ से शुरु
होगी तो उस व्यक्ति को संतान की प्राप्ति नहीं होगी।










14. आयु रेखा की शुरुआत में
जंजीरनुमा होने से व्यक्ति कार्य के शुरुआत
में बुद्धि को स्थिर नहीं रख पाता, हर कार्य
में उतावलापन होता है, इस कारण कभी-ंउचयकभी
असफलता का मुंह देखना पड़ता है।
मनःस्थिति भी संकुचित हो जाती है।









15. यदि आयु रेखा को प्रारम्भ में कोई अन्य
रेखा काट रही है तो दमा सम्बन्धी हृदय या
फेफड़े आदि का रोग होता है। प्रायः सर्दी
जुकाम एवं स्नोफिल से संबंधित परेशानियों
का सामना करना पड़ता है।











16. शनि पर्वत से कोई मोटी
रेखा आकर आयु रेखा को
काट दे तो पशु द्वारा व्यक्ति को चोट आ
सकती है। ऐसे लोगों को पशु संबंधित कार्य
करते समय संवेदनशील रहना चाहिए, ताकि
भविष्य की घटनाओं से सुरक्षा मिल सके।




यह रेखा शास्त्र के अनुसार शायद कुछ महान पुरुषों में पायी गयी
है। जैसे आज अनेक व्यक्तियों को सिंह, हाथी, मगरमच्छ आदि के
द्वारा मृत्यु होती है। ऐसे लोगों में अधिकांशतः सर्कस के
कार्यकर्ता पाये जाते हैं।

जीवन रेखा और रोग


  •  जीवन रेखा से नीचे की ओर गिरती शाखायें, तारक, (स्टार) चिह्न होने
  • से री-सजय़ की हड्डी से सम्बन्धी बीमारी होती है।
  •  जीवन रेखा से शनि पर्वत पर उपस्थित जाली क्रास चिह्न तक जाने से
  • पित्त सम्बन्धी बीमारी होती है।
  •  जीवन रेखा को काटकर स्वास्थ्य रेखा से मिलती हुई लहरदार रेखा पित्त
  • ज्वर उत्पन्न करती है।
  •  रेखा पर वृत्त अथवा धब्बा होने से नेत्र की बीमारी होती है।
  •  जीवन रेखा को काट कर रेखा जाल युक्त प्रथम मंगल पर जाती रेखा
  • रक्त विकार एवं खांसी उत्पन्न करती है।
  •  जीवन रेखा के साथ-ंउचयसाथ जाती हुई मष्तिष्क रेखा, मष्तिष्क ज्वर
  • उत्पन्न करती है।
  •  जीवन रेखा पर सफेद विन्दु होने से मोतियाविन्द या आंख की अन्य
  • बीमारी होती है।
  •  जीवन रेखा को यदि स्वास्थ्य रेखा काटती है तो पाचन सम्बन्धी बीमारी
  • होती है।
  • जीवन रेखा को काटकर सूर्य क्षेत्र तक जाती रेखा सूर्य पर्वत पर रेखा
  • समूह अथवा गुणक चिह्न होने से हृदय सम्बन्धी बीमारी होती है।
  • जीवन रेखा पर द्वीप तथा आड़ी रेखाओं से भरा हाथ मानसिक अशान्ती
  • का द्योतक है।
  •  जीवन रेखा पर उपस्थित द्वीप को काटती एक रेखा आंख की शल्य
  • चिकित्सा का संकेत देती है।




सौजन्य  - सरल हस्तरेखा पुस्तक 

Hastrekha Vigyan Aur Jivan Rekha



हस्तरेखा और त्रिभुज चिन्ह



त्रिभुज


हाथ में केवल अशुभ लक्षण देखकर किसी निर्णय पर पहुँच जाना अनुचित है। मानव हाथ में गौण एवं मुख्य रेखाओं के साथ-ंउचयसाथ अनेक प्रकार के चिह्न भी पाये जाते हैं जिनमें मुख्यतः विन्दु, क्रास, वर्ग, जाल, तारे (स्टार) त्रिभुज, वृत्त, द्वीप, मत्स्य, पेड़, धनुष, कमल, सर्प आदि हैं।

तीनों ओर से परस्पर मिली हुई रेखाएँ त्रिभुज कहलाती हैं, गहरी रेखाओं
से निर्मित त्रिभुज शुभ फलदायी होता है। वैसे तो त्रिभुज बहुत कम हाथों
में पाये जाते हैं। यह जितना ज्यादा बड़ा होगा, उतना श्रेष्ठ एवं फलदायी
माना जाता हैं। जिस व्यक्ति के हाथ के मध्य में त्रिभुज होगा।


वह सद्गुणी,

सच्चरित्र वाला, भाग्यवान, क्रियाशील, ईश्वर में आस्था रखने वाला और
उन्नतिशील होता है। ऐसा व्यक्ति शान्त एवं मधुरभाषी, तथा धीर-ंउचयगम्भीर
होता है। त्रिभुज जितना बड़ा होगा, व्यक्ति उतना ही विशाल हृदय तथा
कठिनाईपूर्वक सफलता प्राप्त करने वाला व्यक्ति होता है तथा आत्मविश्वास
कम होता है। यदि बड़े त्रिभुज में एक ओर छोटा त्रिभुज बन जाये तो वह
अवश्य ही उच्च पद को प्राप्त करता है।
मंगल क्षेत्र पर निर्दोश त्रिभुज होने से व्यक्ति धैर्यवान, रणकुशल तथा वीरता
के लिए राष्ट्रीय पुरष्कारों से सम्मानित होता है, युद्ध में वह अपूर्व वीरता
दिखलाता है। मुसीबत में भी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता। ऐसा
व्यक्ति सेना का कोई बड़ा आफीसर हो सकता है। किन्तु दूषित त्रिभुज
होगा तो व्यक्ति निर्दयी और कायर होगा।
बुध क्षेत्र पर त्रिभुज होने से सफल वैज्ञानिक या अच्छा व्यापारी होता है।
उसका व्यापार देश-ंउचयविदेश में फैला होता है तथा ये दूसरे की कमजोरीसम-हजयने में माहिर होते हैं। गुरु क्षेत्र में ़ित्रभुज होने से व्यक्ति चतुर, कार्य
में दक्ष, कुशाग्र बुद्धि वाला एवं सदैव उन्नति की आकांक्षा वाला होता है।
ऐसे व्यक्ति धूर्त एवं सफल कूटनीति वाले भी होते हैं। लोगों को अपने प्रभाव
में रखने की कला इनमें खूब होती है त्रिभुज में दोष होने पर व्यक्ति घमण्डी,
बातूनी तथा स्वयं की तारीफ करने वाला होता है।
शुक्र क्षेत्र में निर्दोश त्रिभुज होने से व्यक्ति का आंशिक मिजाज, सरल तथा
सौम्य स्वभाव का स्वामी होता है। ऐसे व्यक्ति ललित कला, संगीत, नृत्य
आदि में रुचि रखने वाले होते हैं। दूषित त्रिभुज होने से व्यक्ति को कामान्ध
बनाता है। अगर स्त्री के हाथ में ऐसा त्रिभुज होगा, तो वह परपुरुष गामिनी
होती है। शनि क्षेत्र पर निर्दोष त्रिभुज होने से व्यक्ति तंत्र-ंउचयमंत्र साधना में
दक्ष एवं गुप्त विद्या तथा वशीकरण का ज्ञाता होता है। दोषपूर्ण त्रिभुज होने
पर व्यक्ति को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का ठग एवं धूर्त बनाता है। हृदय रेखा पर
यह चिह्न होने से लेखन कार्य में ख्याति प्राप्त होती है।
भाग्य रेखा पर होने से भाग्योन्नति में बाधाएं आती हैं।
चन्द्र रेखा पर होने से विदेश यात्रायें होती हैं।
विवाह रेखा पर होने से विवाह में बाधा होती है।
आयु रेखा पर होने से दीर्घायु मिलती है।

सौजन्य  - सरल हस्तरेखा पुस्तक 



हस्तरेखा और वर्ग चिन्ह



वर्ग


हाथ में केवल अशुभ लक्षण देखकर किसी निर्णय पर पहुँच जाना अनुचित है। मानव हाथ में गौण एवं मुख्य रेखाओं के साथ-ंउचयसाथ अनेक प्रकार के चिह्न भी पाये जाते हैं जिनमें मुख्यतः विन्दु, क्रास, वर्ग, जाल, तारे (स्टार) त्रिभुज, वृत्त, द्वीप, मत्स्य, पेड़, धनुष, कमल, सर्प आदि हैं।

चार भुजाओं से घिरे हुए क्षेत्र को वर्ग कहते हैं। कुछ लोगों के मत से इसे समकोण भी कहा जाता है। जब एक सुविकसित वर्ग से होकर भाग्य रेखा निकल रही हो तो व्यक्ति के भौतिक जीवन में यह संकट का द्योतक है।



जिसका सम्बन्ध आर्थिक दुर्घटना या हानि से है। परन्तु वर्ग को पार करकेआगे ब-सजय़ती हुई भाग्य रेखा खतरा नहीं उत्पन्न करती। जब वर्ग रेखा सेबाहर हो तथा स्पर्श मात्र हो एवं शनि पर्वत के नीचे हो तो यह दुर्घटना से रक्षा का सूचक है।

जब मस्तिष्क रेखा सुनिर्मित वर्ग से निकलती है तो यह स्वयं मस्तिष्क की
शक्ति और सुरक्षा का चिह्न माना जाता है। जब वर्ग मस्तिष्क रेखा के ऊपरउठ रहा हो और शनि के नीचे हो तो सिर में किसी प्रकार के खतरे का सूचक है।

हृदय रेखा किसी वर्ग में प्रवेश करने से प्रेम के कारण भारी संकट का
सामना करना पड़ता है।

जब जीवन रेखा वर्ग में से गुजरती हो तो यह इस बात का सूचक है कि
उस आयु पर व्यक्ति की दुर्घटना होगी, परन्तु मृत्यु से रक्षा होगी। 

शुक्र पर्वत
पर होने से काम संवेगों के कारण संकट से रक्षा होती है, ऐसी स्थिति में
व्यक्ति काम वासना केे कारण अनेक तरह के खतरे में पड़ता है, लेकिन
हमेशा बच निकलता है।

वर्ग जीवन रेखा के बाहर हो तथा मंगल क्षेत्र से आकर जीवन रेखा को
छू रहा हो, तो इस स्थान पर वर्ग के होने से कारावास या भिन्न प्रकार का
रहन सहन होता है।

जब वर्ग किसी भी पर्वत पर होता है तो उस पर्वत के गुणों के कारण होने
वाले किसी भी अतिरेक से रक्षा का सूचक होता है।

गुरु पर होने से व्यक्ति की आकांक्षा से उसे रक्षा प्रदान करता है। 

शनि पर होने से खतरों से रक्षा करता है। 

सूर्य पर होने से प्रसिद्धि की इच्छा को ब-सजय़ाता है।

चन्द्र पर होने से अधिक कल्पना एवं अन्य रेखा के दुष्प्रभाव से
बचाव होता है। 

मंगल पर होने से शत्रुओं से होने वाले खतरों से बचाता है। 

बुध पर होने से उद्विग्नता एवं चंचल वृत्ति से बचाता है।



सौजन्य  - सरल हस्तरेखा पुस्तक



हस्तरेखा और बिंदु चिन्ह



विभिन्न प्रकार के चिह्न



हाथ में केवल अशुभ लक्षण देखकर किसी निर्णय पर पहुँच जाना अनुचित है। मानव हाथ में गौण एवं मुख्य रेखाओं के साथ-ंउचयसाथ अनेक प्रकार के चिह्न भी पाये जाते हैं जिनमें मुख्यतः विन्दु, क्रास, वर्ग, जाल, तारे (स्टार) त्रिभुज, वृत्त, द्वीप, मत्स्य, पेड़, धनुष, कमल, सर्प आदि हैं।

विन्दु-ंउचयविन्दु प्रायः अस्थायी रोग परिचायक है, एक चमकीला और लाल विन्दु यदि:-ंउचय
Û मस्तिष्क रेखा पर होगा तो किसी आघात या गिरने के कारण घायल अथवा
चोट का निशान होगा। भूरा अथवा नीला विन्दु स्नायु रोग का चिह्न है।



  •  स्वास्थ्य रेखा पर चमकीला लाल विन्दु प्रायः बुखार होने की सूचना देता
  • है।
  •  जीवन रेखा पर होने से बीमारी का द्योतक है, जो ज्वर प्रकृति का होगा।
  • काला विन्दु धन-ंउचयदौलत की प्राप्ति का संकेत देता है सफेद विन्दु उन्नति
  • का सूचक है।
  •  मंगल रेखा पर काला विन्दु होने पर व्यक्ति कायर होता है।
  •  बुध क्षेत्र पर होने से व्यक्ति धोखेबाज अथवा ठग होता है।
  •  गुरु क्षेत्र पर होने से विवाह में अड़चनें और अपयश होता है।
  •  शुक्र क्षेत्र में काला विन्दु होने से व्यक्ति कामपिपासु होता है, पर गुप्तांगों
  • में बीमारी होने से अपनी काम पिपासा को शान्त नहीं कर पाता। ऐसे लोग
  • पत्नी या प्रेमिका द्वारा तिरस्कार किये जाते हैं।
  •  शनि क्षेत्र में होने से प्यार के मामले में बदनामी तथा पति पत्नी में रंजिस।
  •  रवि क्षेत्र में काला विन्दु होने से प्रतिष्ठा प्रभावित होती है।
  •  राहु क्षेत्र में होेेेेेने से युवावस्था में धन की कमी, केतु क्षेत्र में बचपन से
  • बीमार होता है।
  •  चन्द्र क्षेत्र में होने से विवाह में देरी एवं प्रेम में निराशा,
  •  भाग्य रेखा पर होने से भाग्योदय में बाधा।
  •  जीवन रेखा पर होने से लम्बी बीमारी,
  •  विवाह रेखा पर होने से सिर में भारी चोट और हृदय दुर्बल होता है। 


सौजन्य  - सरल हस्तरेखा पुस्तक 

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