Sunday, February 19, 2017

हाथ का रंग रूप और उंगलिया - हस्तरेखा




प्रथम अध्याय में हम बनावट के अनुसार हाथों की आकृति को तीन भागों में विभक्त कर आये हैं जिनका यथा स्थान वर्णन भी किया जा चुका है। अब हम उसी प्रकार उगलियों से सम्बन्धित लक्षणों का वर्णन, जिसके बिना हस्त-परिचय-ज्ञान अधूरा सा रह जाता है सर्व साधारण के लिये पूर्ण रूप से करेंगे। अभी तक देखने में यही आया है कि समस्त जगतीमय हाथों की बनावट रूप और रंग के अनुसार केवल तीन ही भागों में विभक्त कर सकते हैं। जिसके लिये अतिशय-अनुसन्धान की आवश्यकता नहीं होती । देखने से ही प्रत्यक्ष पता चल जाता है।

(१) पहले नम्बर पर वही हाय आते हैं जिनका रंग गुलाबी होता ।
(२) दूसरे नम्बर पर वह हाथ आते हैं जिनका रंग लाल होता है।
(३) तीसरे नम्बर पर वह हाथ आते हैं जिनका रंग सफेदी लिये लाल होता है ৷

अब हम उपयुक्त तीनों प्रकार के हाथों का वर्णन गुण, कर्म और स्वमाव के लक्षणों के अनुसार इस प्रकार करेंगे कि पाठकों को यह भली भाँति विदित हो जायगा कि मनुष्य के हाथों की प्राकृतिक बनावट के साथसाथ उसके रंग, गुण और लक्षणों का उसके जीवन पर कसा प्रभाव पड़ता है। यदि प्रेक्षक हाथ देखते समय धर्य और शान्ति से काम ले तो उसको, किसी भी हाथ को देखकर उसके जीवन का सारांश वर्णन करने में कोई भी कठिनाई प्रतीत नहीं होगी। इसलिये प्रत्येक हस्त प्रेक्षक को प्रारम्भ में बड़े ही अभ्यास तथा परिश्रम की आवश्यकता है। नितिन कुमार पामिस्ट

(१) जिन हाथों का रंग गुलाबी होता है उनके दर्श-स्पर्श से ही ज्ञात हो जाता है कि वे अतिशय कोमल, मुलायम तथा हल्के होते हैं। जो कि किसी भी प्रकार के परिश्रमरत या मेंहनती कार्य को करने में सर्वथा असमर्थ ही रहते हैं। ऐसा मनुष्य आराम तलब, सुस्त तथा दीर्घ सूत्री होता है। जो कि आपत्ति की सम्भावना से ही घबरा जाता है। किसी भी भावी विपति का संकल्प ही उसके हाथ पैर फुला देता है। दम फूलना, हाथ पैरों में कम्पन, हृदय में धड़कन आदि उसके स्वभाविक गुण हैं। इस कारण वे कार्य कुशल होते हुए भी सफलता नहीं पाते। ऐसे व्यक्ति अधिकतर देवाराधक, धार्मिक तथा समाज सेवी प्रकृति के होते हैं। उनकी मिलनसारी उनके बहुत से कार्यों के करने में बहुत ही सहायक होती है। ये लोग समाज में प्रधान या सभापति का आसन ग्रहण करते हैं और छोटे बड़े सभी को उत्तम सलाह देते हैं। ऐसे मनुष्यों के शत्रु बहुत ही कम तथा मित्रों की संख्या बहुत होती है। नितिन कुमार पामिस्ट

(२) जिन हाथों का रंग लाल सुर्ख अथवा रक्तिम होता है वे दबाने में अत्यन्त सख्त या कठोर प्रतीत होते हैं। ऐसे व्यक्ति बड़े ही परिश्रमी, विपति का सामना बड़े ही साहस के साथ हृदय में धैर्य और शान्ति धारण कर करते हैं। ये लोग बड़े ही चुस्त, चालाक तथा फुर्तीले होते हैं। जो कि अपनी मेहनत के कारण अपने जीवन के अधिकतर कार्यों में सफल होते देखे गये हैं या देखे जाते हैं। एसे व्यक्ति दुखों को तथा मुसीबतों को अपना पथ प्रदर्शक समझ कर ही अपने कार्यों को दुगुचे उत्साह से करते हैं। ये लोग अपने उत्सवों को बड़े ही उल्लास तथा उत्साह से मनाते हैं। ये किसी-किसी के सच्चे मित्र तथा प्रत्यक्ष शत्रु भी होते हैं। इन्हें क्रोध बहुत ही जल्दी आता है किन्तु अपनी बात के पक्के होते हैं। इनके मित्रों की संख्या न्यून तथा शत्रुओं की संख्या अधिक होती है। ये तनिक सी बात पर झगड़ा करने पर उतारू हो जाते हैं। ये धर्म को अपने सुभीते के अनुसार ही मानते हैं। समाज सेवा कर्तव्य समझ कर नहीं किन्तु नामवरी के लिए खूब करते हैं।

(३) तीसरे नम्बर पर वह हाथ आते हैं जिनका रंग न गुलाबी है और न सुर्ख ही बल्कि सफेदी लिए होते हैं। ऐसे हाथों वाले व्यक्ति किसी विशेष गुण से प्रभावित न होकर सभी गुणों के अन्तर्गत विचरण करते हैं। ऐसे व्यक्ति बहुत ही कम शिक्षित होते हैं और जो पढ़ जाते हैं बड़े ही चुस्त, चालाक तथा स्वार्थी प्रतीत होते हैं। बातों में किसी को बोलने नहीं देते। यद्यपि ऐसे व्यक्ति व्यापारी, दस्तकार कलाकार, कवि लेखक आदि सभी कार्य करने वालों में पाए जाते हैं फिर भी मजदूर पेशा अघिकतर होते है। व्यापारी आदमियों के हाथ मुलायम और मजदूरों के हाथ बड़े ही सख्त तथा कठोर होते है। जो कि किसी प्रकार की भी उन्नति न करके छोटे-छोटे कार्यों को करके ही अपना पेट पालते है। पत्थर तोड़ना, सड़क कूटना झल्ली ढोना, मिट्टी उठाना आदि कार्य करके जीवन यापन करते हैं। जिनको पेट पूजा के अतिरिक्त किसी दूसरे की पूजा की आवश्यकता ही नहीं होती । ये लोग अनपढ़ होने पर भी अपनी प्रान्तीय भाषा में अच्छे-अच्छे लोक गीत अपनी मंडली में बड़े ही उत्साह के साथ गाया करते हैं। इनके जीवन का ध्येय अपने ही समाज या समूह में नम्बदारी ले लेने के अतिरिक्त कोई और विशेषता नहीं रखता। ये उन्नति-अवनति से बहुत दूर सांसारिक बन्धनों के अति निकट रहते हैं। इनके मित्र-शत्रु समान ही होते हैं। कुछ लोग कार्य व्यस्तता के कारण शान्त ही बने रहते हैं और कुछ कार्य न होने के कारण आपसी झगड़ों में बड़ा उत्साह दिखाते हैं। नितिन कुमार पामिस्ट

उपयुक्त सभी प्रकार के हाथों का अच्छे और बुरे प्रभाव से प्रभावित होना उनसे सम्बन्धित ग्रह स्थानों तथा उगलियों के शुभअशुभ प्रभाव से बहुत कुछ समझाया जा सकता है। अब हम सर्व प्रथम उगलियों के प्रभाव का ही विशेष रूप से वर्णन कर अपनी वर्णन शैली का सम्पादन करेंगे। यह बात प्रत्यक्ष रूप से सभी जानते हैं कि प्रत्येक हाथ में चार उगली तथा पांचवाँ अँगूठा होता है किन्तु ऐसा भी देखने में आता है कि किसी-किसी हाथ में चार उगली दो अँगूठे या एक अँगूठा पाँच उगली सब मिलाकर कुल संख्या छे भी हो जाती है। यद्यपि यह बात सैकड़ों हजारों में एक आध ही जगह देखने को मिलती है जिसका कोई विशेष प्रभाव जीवन पर अच्छा या बहुत ही बुरा पड़ता दिखाई नहीं पड़ता। इसलिये हम इस विषय को विशेष रूप से तूल न देकर चार ही उगलियों तथा एक ही अँगूठे का वर्णन कर अपने लक्ष पर पहुंचेगे।

९. यहाँ यह बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि हथेली से जुड़ी हुई उगलियों का विशेष सम्बन्ध हथेली से होते हुए भी मस्तिष्क से कहीं अधिक है। पोरुओं पर भी किसी भारी वस्तु का दबाव पड़ जाने पर मस्तिष्क धमनियों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है और अचानक सिर में चक्कर आ जाता है। जिस कारण एक प्रकार का विशेष भय हृदय में बैठ जाता है। जिससे कार्य करने में रूचि नहीं रहती। कभीकभी अत्यधिक दबाव पड़ जाने से हृदय की गति तक रुक जाती है और रक्त संचालन, गति विरोध हो जाने के कारण कितने ही व्यक्ति उन्मादी या पागल होते देखे गये हैं। ये ही उंगलियाँ साधारण रूप से प्रत्येक हाथ में चार होती है। जिनके नाम इस प्रकार निम्नांकित किये जाते है।



(१ ) तर्जनी (Index Finger)
(२ ) मध्यमा (Middle Finger)
(३ ) अनामिका (Ring Finger)
(४ ) कनिष्टिका (Little Finger)

(१) तर्जनी उंगली-वह उगली कहलाती है जो कि अँगूठे के सबसे समीप है। इसको प्रथम उँगली भी कहते हैं। इसके नीचे गुरु या बृहस्पति देवता निवास करते हैं। इसलिए इसे गुरु या बृहस्पति की उगली भी कहा जाता है। संस्कृत में इसे तर्जनी नाम इसलिये दिया गया है कि यह तर्जन कार्य में सबसे आगे रहती है। जैसे किसी को डाटना हो या पथ का प्रदर्शन करना हो तो तर्जनी उगली ही सर्व प्रथम मार्ग दर्शक बनेगी। इसीलिये इसे तर्जनी नाम दिया गया है।

(२) मध्यमा उगली—तर्जनी के साथ वाली उँगली को मध्यमा उगली कहते हैं। इसके मूल में शनि देव निवास करते हैं। इसलिये इसे शनि की उगली भी कहा जाता है। वास्तव में यह मध्य में होने के कारण संस्कृत में मध्यमा कहलाती है। क्योंकि इसको अँगूठे तर्जनी, अनामिका तथा कनिष्टिका का मध्य भाग प्राप्त है । इसकी स्थिति मध्य में होने के कारण मध्यमा कहलाती है। नितिन कुमार पामिस्ट

(३) अनामिका उंगली-तीसरी उगली जो मध्यमा के साथ है अनामिका कहलाती है। इसके मूल में रवि या सूर्य का निवास स्थान है। इसलिये इसे रवि उगली भी कहते हैं। अनामिका का अर्थ बिना नाम वाला है इसलिये इसे संस्कृत में अनामिका नाम दिया गया है। वास्तव में इस उंगली का कोई भी नाम न होने के कारण इसे अनामिका नाम से पुकारा जाता है।

(४) कनिष्टिका उंगली-अनामिका के साथ वाली चौथी उगली की कनिष्टिका कहते हैं इसके मूल में बुध देवता निवास करता है। इसलिये इसे बुध की उगली भी कहते हैं। कनिष्टिका का अर्थ छोटा होने के कारण इसे संस्कृत में कनिष्टिका नाम दिया गया है। यह वास्तव में यथा नाम तथा गुण होने के कारण कनिष्टिका कहलाती है। यह सभी उगलियों से छोटी होने के कारण कनिष्टिका नाम से पुकारी जाती है । नितिन कुमार पामिस्ट

अब हम तर्जनी से लेकर कनिष्टिका तक का वर्णन अपने पाठ्य-क्रम के अनुसार क्रमशः निम्नांकित करेंगे ।
प्रथम तर्जनी उंगली-इसको अंग्रेजी में Index Finger या Finger of Jupiter जिसका अधिपति या स्वामी गुरु या बृहस्पति कहलाता है। संसार के ९५ प्रतिशत हाथों में इसकी लम्बाई
अनामिका की लम्बाई से अर्थात् Ring Finger या The Finger of Apollo से छोटी होती है फिर भी २ या ५ प्रतिशत हाथों में इसकी लम्बाई अनामिका या रवि उगली के समान या उससे बड़ी होती है। जिन हाथों में गुरु या बृहस्पती की उगली अनामिका या रवि उगली से बड़ी होती है वे लोग घमण्डी, चरित्रवान, सौन्दर्य शक्ति के उपासक तथा किसी भी कार्य या बात का उत्तरदायित्व लेने वाले तथा सदैव प्रसन्न रहने वाले होते हैं। यदि तर्जनी उगली की लम्बाई मध्यमा ऊँगली अर्थात Middle Finger या Finger of Saturn के समान या उससे बड़ी हो तो मनुष्य बड़ा ही आराम तलब तथा खेल तमाशों में दिलचस्पी लेने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति का अहभाव या घमण्ड बढ़कर उसके ही निरादर का कारण बन जाता है। ऐसे मनुष्य सदा ही बढ़-चढ़कर बातें करने वाले खुशामद पसन्द होते हैं। धर्म से उनकी रूचि हट जाती है और हठ धर्म में बढ़ जाती है। और यदि उगली नोकीली हुई तो ऐसे मनुष्य धर्म से एकदम विमुख हो जाते हैं। वे दूसरों पर सदा हुकूमत ही चलाने की सोचा करते है और अपने मातहत काम करने वालों को तकलीफ देने के आदी होते हैं। इसलिये ऐसे व्यक्ति सादे-सीधे रहने पर भी कुछ विश्वसनीय घमण्डी होते हैं। जिस कारण उनसे कोई भी प्रसन्न नहीं रहता। किन्तु उनके सम्मुख उनकी सत्य बात भी लोग कहते हुए हिचकते हैं। वे कायदे कानून की पर्वाह कम करते हैं कि वे दूसरों पर शासन करने के लिये ही पैदा हुए हैं। उनकी यह अनाधिकार चेष्टा कभी-कभी उन्हें नीचा दिखाये बिना नहीं रहती, जिसका उन्हें बहुत दुख तथा अफसोस होता है। किन्तु वे अपने स्वाभाविक गुण के कारण अपने धैर्य तथा हिम्मत को कम नहीं होने देते । यही विशेषता उन्हें जीवन में जीने के लिये बाध्य करती है। यदि तर्जनी मध्यमा'उगली से छोटी हुई तो साधारण जीवन व्यतीत होता है और यदि यह अनामिका उगली से छोटी हुई तो मनुष्य काफी से ज्यादह चुस्त तथा चालाक होता है। वह किसी भी कार्य का उत्तरदायित्व अपने ऊपर न लेकर अपने कार्य को सदैव दूसरों से कराकर यशस्वी होता है। यदि तर्जनी उगली एक दम उतार-चढ़ाव की ढलवाँ हो तो मनुष्य अनेक प्रकार के भोजन करने वाला होता है। वह गरीब हो या अमीर अपनी हैसियत के मुताबिक, खाते समय भाँतिभाँति की सब्जियाँ तथा पदार्थ खाना पसन्द करता है। न जुड़ने पर रूखा सूखा अनिच्छा से खाकर पेट तो भर लेता है किन्तु प्रसन्न नहीं रहता। उसके कपड़े फटे ही क्यों न हों किन्तु साफ होने चाहिये वे तभी पहन सकते है। उनकी कुछ ऐसी प्रकृति होती है। नितिन कुमार पामिस्ट

द्वितीय मध्यमा उंगली :- इस उंगली को अंग्रेजी में Middle Finger या finger of Saturn कहते है और प्रायः यह ऊँगली अनामिका और तर्जनी की अपेक्षा कुछ बड़ी ही होती है। इसका किसी हद तक इन दोनों उँगलियों की अपेक्षा कुछ बड़ा रहना ही मनुष्य जीवन के लिये हितकर है। क्योंकि हाथ में यही उँगली मनुष्य के भाग्य की प्रतीक होती है और कहा भी है बड़ी उंगली बड़ा भाग, छोटी उँगली छोटा भाग। किन्तु इसका 3 इन्च से उन दोनों की अपेक्षा अधिक लम्बा होना छोटे होने की अपेक्षा अधिक खतरनाक होता है। इसकी लम्बाई 3 इन्च तक बढ़ जाना और तर्जनी तथा अनामिका का उससे काफी छोटा रह जाना उस मनुष्य के दुख, भय, उदासी तथा स्वार्थादि अवगुणों का बढ़ जाना प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करता है। इसके अतिरिक्त 3 इन्च लम्बाई का बढ़ जाना ही सर्व साधारण में अनेक शुभ गुणों के बड़ जाने का एक मात्र शुभ लक्षण प्रत्यक्ष दिखाई देता है। ऐसा मनुष्य बुद्धिमानी से शासनशक्ति प्राप्त करता है। और अपने शुभ विचारों द्वारा सदैव उन्नति की ओर अग्रसर रहता है । वह सदा मितव्ययता का ध्यान रखकर कार्य सम्पन्न करता है। परिश्रम तथा शान्ति से कार्य करने वाला वह व्यक्ति कभी कुत्सित विचारों का दास नहीं होता है। जब मध्यमा उंगली उक्त कथित दोनों उँगलियों की अपेक्षा ३ इन्च लम्बी होती है तो उसका प्रभाव मनुष्य को क्रान्तिकारी, विप्लवकारी-कातिल-हत्यारा अथवा जंगल में रहने वाला उदासीन, अवधूत कापालिक तथा आत्महनन या खुदकशी करने वाला बना देती है। यह उँगली मनुष्य की भाग्य विधाता मानी जाती है फिर भी इसका यह अर्थ नहीं हो जाता कि उँगली के शुभ या अशुभ प्रभाव के सम्मुख दूसरे शुभ या अशुभ चिन्हों तथा रेखाओं का इसके विपरीत कोई प्रभाव ही नहीं होता, वास्तव में ऐसी बात नहीं है। सब ही शुभ तथा अशुभ चिन्ह अथवा रेखायें बलवान होने पर इसके विरुद्ध भी अपना अच्छा-बुरा, शुभ-अशुभ तथा मिला-जुला सभी प्रकार का अपना प्रभाव दिखाती है। उंगली, चिन्ह तथा रेखाओं की विशेष प्रवृत्ति जिधर होगी मनुष्य उधर ही जायगा और उसी कार्य में सफलता प्राप्त करेगा। तिसपर भी मध्यमा उँगली का आवश्यकता से अधिक लम्बा होना प्रत्येक अवगुण का सहायक है। इसलिये भाग्य रेखा का मध्यमा उँगली के तृतीय पोरुए तक आना, जो कि हथेली से जुड़ा होता है, उसके दुर्भाग्य को प्रदर्शित करता है। इसलिये किसी भी उँगली तथा रेखा का जरूरत से अधिक बढ़ जाना लाभप्रद होने के स्थान पर हानि ही करता है। यह बात प्रेक्षक को अवश्य ही ध्यानपूर्वक देख लेना चाहिये ।

तृतीय अनामिका उंगली -जिसकी अंग्रेजी में Ring-Finger या The Finger of Apallo भी कहते है अधिकतर हाथो में मध्यमा या शनि की उंगली से छोटी और तर्जनी या वृहस्पति की अँगुली से बड़ी होती है। किन्तु कहीं-कहीं इसके विपरीत भी दिखाई देता है। और यह अँगुली लम्बाई में मध्यमा अँगुली के समान और किसी हाथ में तर्जनी से छोटी भी दृष्टिगोचर होती है। अनामिका उगली का छोटा या बड़ा किसी प्रकार के विशेष गुण और प्रभाव को प्रदर्शित करता है । इस उगली का तर्जनी से बड़ा होना अत्यन्त शुभ लक्षण है। यह मनुष्य में बुद्धिमानी, दया, चालाकी और रसास्वादन का शौक पैदा करती है। यशकीर्ति, धन-सम्पति, मिलनसारी आदि प्रदान करती है और मनुष्य को अच्छे शुभ तथा घार्मिक कार्यों में सफलता प्रदान करती है और जब यह उगली शनि की उगली के बराबर होती है तो मनुष्य को वृष्ट, प्रमत उन्मत्त, असावधान, जुआरी, सट्टेबाज तथा रेस और शर्त पर धन लगाने वाला बना देती है। ऐसा मनुष्य परिणाम सोचे बिना ही कोई भी कार्य करने लगता है। अनामिका का तर्जनी से किसी भी रूप में छोटा होना और खास तौर पर तब जबकि वह उगली टेड़ी या मरोड़ी हुई के समान दिखाई देती ही विशेष रूप से निम्नांकित अवगुणों से परिपूर्ण होती है। जिन हाथों में उपर्युक्त लक्षणों से युक्त यह उगली होती है वे व्यक्ति विशेष रूप से असभ्य, रूखे, गवारों जैसी बात करने वाले, निर्लज्ज, धृष्ट, कलकित तथा अपयश के भागी होते हैं। किसी भी हाथ में अनामिका का लम्बाई में मध्यमा के समान होना और तर्जनी उगली से छोटा होना, ये दोनों ही बातें किसी भी व्यक्तिगत जीवन के लिये अत्यन्त ही अशुभ फलदायक है । इस उगली का सीवा तथा सुडौल होना बहुत ही शुभ फलदायक है। अवगुणों से रहित तथा गुणों से युक्त होने पर और रवि रेखा के शुभ प्रभाव दिखाने पर मनुष्य को प्रत्येक कार्य में सफलता मिलती है। इन गुणों के साथ-साथ यदि अनामिका का झुकाव, कनिष्टिका उगुली की ओर हो तो व्यापार में अच्छी सफलता प्राप्त होती है। इसके विरुद्ध होने पर विफलता तथा बदनामी का सामना करना पड़ता है। यह उगली यदि बृहस्पति उगली से कुछ बड़ी हो और शनि उगली से कुछ छोटी होने पर ही शुभ फल देती है और ऐसा व्यक्ति धामिक, देवाराचक मिलनसार, समाजसेवी तथा उपकारी होता है। इन शुभ गुणों के कारण ही वह जीवन के प्रथम भाग में ही सफलता प्राप्त कर लेता है और आजीवन उसका उपभोग करता है। नितिन कुमार पामिस्ट

चतुर्थ कनिष्टिका उगली :-इसकी अंग्रेजी में Little Finger या The Finger of Mercury भी कहते है और ये सभी उगलियों से लम्बाई में छोटी होने के कारण ही कनिष्टका कहलाती है। कनिष्टिका अर्थ छोटा है। यद्यपि यह उगली सबसे छोटी है फिर भी गुणों के प्रभाव में शायद सबसे ही बड़ी है। यह अलग-अलग हाथों में अलग-अलग लम्बाई तथा स्थूल की पायी जाती है। यह छोटी-बड़ी तथा मध्यम, तीन प्रकार की होती है जिनका प्रभाव भी पृथक-पृथक है जिस कनिष्टिका की लम्बाई अनामिका के नाखून के आरम्भिक से ऊपर या उसके बराबर तक पहुँचती है सबसे शुभ प्रभाव दिखाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि इसका लम्बा होना एक शुभ लक्षण है। जिन मनुष्यों के हाथों में यह लक्षण होता है वे बड़े ही अच्छे साहित्यकार तथा अनुसन्धानकर्ता होते हैं। ऐसे लोग अच्छे व्यापारी, उत्तम कोटि के कलाकार तथा दस्तकार भी होते हैं। ऐसे व्यक्ति अधिकतर पड़े लिखे तथा बुद्धिमान होते हैं। अभाग्यवश, धनाभाव या सामाजिक कुरीतियों के कारण यदि वे साक्षर न भी हो पाय तो भी वे अवश्य ही किसी विषय के मर्मज्ञ होंगे ऐसा समझना चाहिए । किसी किसी हाथ में कनिष्ठका की लम्बाई अनामिका के दूसरे पोरुए के ऊपर बाले भाग की दूसरी रेखा तक पहुँचती है। यह भी एक अत्यन्त शुभ लक्षण है जिसका होना सफलता प्राप्त करने के लिये अत्यन्त आवश्यक है। इस शुभ चिन्ह के प्रभाव के कारण मनुष्य, अधिकार, प्रतिष्ठा, सामथ्र्य महात्म्य, कार्य शक्ति, बुद्धिमता, प्राकृतिक ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न रहता है। इसके लिये केवल यही आवश्यक नहीं है कि इन गुणों से विभूषित मनुष्य किसी घन सम्पन्न या बड़े घर में ही पैदा हीं बल्कि छोटे मनुष्यों में भी इसका प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है। जो क्लर्क, दफ्तरी, चपरासी इस गुण से विभूषित हैं वे बड़े ही मिलनसार तथा अपने कार्य को बड़ी ही मेहनत, दिलचस्पी तथा योग्यता से करते हैं। ये लोग अपने अफसरों के इशारे को ही समझकर कार्य को उसकी इच्छानुसार अन्जाम देते हैं। इनका स्वभाव शान्त तथा वैर्य धारण करने वाला होता है। इनमें दोष यह है कि ये लोग चरित्र की सफाई के साथ कपड़ों की सफाई पर विशेष ध्यान नहीं देते। जिन हाथों में इसकी लम्बाई अनामिका के मध्य पोरुए के मध्य तक मुश्किल से पहुँचती है उन मनुष्यों में उपयुक्त गुणों का लोप प्राय: होता है । यद्यपि ऐसे व्यक्ति बहुत कम देखने में आते है फिर भी जो हैं उनमें निम्नलिखित अवगुण विशेष रूप से पाये जाते हैं जबकि एक रेखा हृदय रेखा से उठकर कनिष्टिका उगली के तृतीय पोरुए की दूसरी रेखा तक चली जाय । ऐसा व्यक्ति चोरी जारी, डकैती, जेब कतरना, ठगी करना, भटियापन करना, धोखा देना आदि कार्य में बड़ा ही सफल होता है। कनिष्टिका उगली का आवश्यकता से अधिक छोटा होना अत्यन्त ही दुख का कारण हो जाता है। ऐसा मनुष्य अच्छी सभा सोसाइटी तथा समाज से बहिष्कृत ही रहता है । किन्तु निकृष्ट समाज मंडली में वही प्रधान चुना जाता है। सफल जीवन व्यतीत करने के लिये कनिष्टिका उ'गली का लम्बा होना अत्यन्त आवश्यक है ।

नितिन कुमार पामिस्ट

Fingers On Hand




First or Index Finger 

The First Finger is also known as the Finger of Jupiter. It is representative of ego and desire for recognition and position in life.

Middle Finger 

The Middle Finger is also known as the Finger of Saturn. It is representative of balance of mind, discipline and solitude. Responsibility towards life, work and loved ones, can also be determined by the length, marking and leaning of this finger.

Ring Finger 

The Ring Finger is also known as the Apollo finger or the Finger of the Sun. This indicates desire for money, art and fame.

Little Finger 

The Little Finger is also known as the Finger of Mercury. It represents communication skills, eloquence and wit. Business acumen and inclination towards scientific research is also determined by this finger.

Makan Aur Ghar Ki Najar Badha Door Karne Ka Upay



Najar Badha Door Karne Ka Upay

1. Aap apne naye (new) makaan ko buri najar se bachana chahate hai to mukhya darwaze ki chokhat par kaale dhaage se peeli kodi bandhkar latkaane se samast upari badhayo se mukti milti hai.

2. Yadi aapne koi naya (new) vahan khareeda hai aur aap is baat se pareshaan hai ki kuch na kuch roz gaadi mein gadbadi ho jaati hai.  Yadi gadbadi nahi hoti to durghatana ho jaati hai.  Yadi gaadi mein khraabhi nahi hoti hai to accident ki wajah se bina wajah ka kharcha ho jata hai jiski wajah se ghar mein paiso ki kami ho jaati hai.  Apni gaadi par kaale dhaage se peeli kodi bandhne se aap is buri njar se bach sakengey aur is paresaani se mukt ho jaayenge.


3. Yadi aapke ghar par roz koi na koi aapda aa rahi hai.  Aap is baat ko le kar pareshaan hai ki kahi kisi ne kuch kar to nahi diya.  Aise mein aapko chahiye ki ek nariyal ko kaale kapde mein silkar ghar ke bahar lataka de.  


4. Mirch, raai aur namak ko peedit vykti ke sir se vaar kar aag mein jala de. Chandrma jab raahu se peedit hota hai tab najar lagti hai.  Mirch mangal ka, raai shani ka aur namak rahu ka parteek hai.  In teeno ko aag (mangal ka parteek) mein daalne se najar dosh door ho jata hai.  Yadi in teeno ko jalane par teekhi gandh na aay to najar dosh samasjhana chahiye.  Yadi aay to anya upay karne chahiye.


5. Yadi aapke bacche ko najar lag gayi hai aur har wakt pareshaan aur bimar rahta hai to laal sabut mirch ko bacche ke upar se teen baar vaar kar jalti aag mein daalne se najar utar jaaygi aur mirch ka dhachka bhi nahi lagega.

6. Yadi koi vykti buri najar se paresaan hai to shaniwar ke din kaccha doodh uske upar se saat bar vaarkar kutte ko pila dene se buri najar ka prabhaav door ho jata hai.

7. Yadi koi vykti buri najar se paresaan hai to mangalwar ke din hanuman mandiar jaa kar unke kandhe se sindor le kar najar lagey vykti ke lalaat par ye soch kar tilak kar de ki aisa karne par ye najar dosh se mukt ho gaya hai

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1. Namak, raai, raal, lahsun, pyaaj ke sukhey chilkey va sookhi mirch angaare par daalkar us aag ko rogi ke upar saat baar ghumane se buri najar ka dosh mit jata hai. 

2. Shaniwar ke din hanuman mandir mein ja kar prempoorvak hanuman ji ki aradhana kar ke unke kandhey par se sindoor lakar najar lagey hue vykti ke maathe par lagane se buri najar ka prabhaav kam hota hai.


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5. Najar lagey hue vykti ko paan mein gulaab ki saat pankhudiya rakh kar isth-devta ka naam le kar khilay aisa karne par najar laga hua vykti  buri najar ke prabhaav se mukt ho jaayga.

6. Laal mirch, ajwain, aur peeli sarson ko mitti ke ek chotte bartan mein aag lekar jalay.  Uski dooph najar lagey bacche ko de.  Kisi bhi prakaar ki najar theek ho jaaygi.


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Client's Feedback - NOVEMBER 2017



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