Tuesday, March 20, 2018

Hath Mein Vivah Rekha Hone Par Bhi Shadi Na Hona | Hastrekha Aur Vivah

ज्योतिष शास्त्र में हाथ में विवाह रेखा होने पर भी शादी नहीं होना का कारण | Marriage Line On Hand But Still Unmarried Palmistry

ज्योतिष शास्त्र में हाथ में विवाह रेखा होने पर भी शादी नहीं होना का कारण | Marriage Line On Hand But Still Unmarried Palmistry

अब तक कितने ही हाथों में यह बात देखने को मिली है। कि जिन हाथों में विवाह रेखा साफ तौर पर बुध क्षेत्र पर दिखाई देती है। उनमें बहुत से मनुष्य अविवाहित ही रह जाते हैं और बहुत कम संख्या में ऐसे भी व्यक्ति मिलते हैं कि जिनके हाथों में विवाह रेखा का अभाव होते हुए भी एक के स्थान पर दो-दो विवाह तक करते देखे गये हैं। पामिस्ट तथा हस्त शास्त्र विशेषज्ञ इस स्थान पर अपनी मस्तिष्क दुर्बलता देखकर कुछ हैरान से हो जाते हैं कि उनका कथन असत्य क्यों हुआ जबकि हस्त-रेखा-परिचय की सभी पुस्तके किसी न किसी रूप में इस विवाह रेखा की समर्थक ही रही हैं। 

यह बात एक अच्छे प्रेक्षक के मस्तिष्क में उथल-पुथल मचा देती है । जिस कारण उसे रातों नींद नहीं आती । किन्तु विवश है मनुष्य विधि के विधान से, और वहाँ तक पहुँचने की विवशता से अन्त में किसी न किसी गतिविधि द्वारा उसे सन्तोष ही करना पड़ता है फिर भी यह बात उसके हृदय में काँटे के समान हर समय खटकती रहती है और वह अभ्यासगत उस अपनी पराजय के अन्वेषण में लगा रहता है। ये लेख भारत के प्रसिद्ध हस्तरेखा शास्त्री नितिन कुमार पामिस्ट द्वारा लिखा गया है अगर आप उनके दवारा लिखे सभी लेख पढ़ना चाहते है तो गूगल पर इंडियन पाम रीडिंग ब्लॉग को सर्च करें और उनके ब्लॉग पर जा कर उनके लिखे लेख पढ़ें । किन्तु अब देखना यही है कि ऐसा क्यों होता है । इसके लिये हस्त प्रेक्षक स्वयं उत्तरदायी है । क्योंकि संसार में कुछ मनुष्य ऐसे भी हैं जोकि किसी प्रकार का प्रेम सम्बन्ध अथवा विवाह किसी से भी करना ही नहीं चाहते और अपनी प्रबल इच्छा शक्ति की प्रखरता से विवाह का समय टाल देते हैं। 

समय के टल जाने पर अथवा आयु के बढ़ जाने पर या अपने योग्य वर-वधु के न मिलने पर कोई भी स्त्री या पुरुष अविवाहित ही रह सकता है। इसमें कोई विशेष परेशानी की बात नहीं है। यहाँ आत्मशक्ति की प्रखरता ही प्रबल मानी जायगी जिसके कारण मनुष्य ने प्राकृतिक नियम का उल्लंघन कर दिया है। भारतीय दार्शनिकता में यह बात प्रत्यक्ष रूप से प्रकट कर दी गई है कि समस्त संसार ही नहीं बल्कि यह तमाम सृष्टि चक्र ही किसी की इच्छा शक्ति या आत्म-शक्ति के बल पर चल रहा है । यदि यह इच्छा शक्ति । योग द्वारा ब्रह्ममय विलीन कर दी जाय तो प्रत्येक मनुष्य इस सृष्टि चक्र का संचालन करने में यथेष्ट रूप से समर्थ हो सकता है क्योंकि ब्रह्म से दूसरी वस्तु या ब्रह्म के अतिरिक्त संसार में कुछ भी नहीं है। इसलिये इस ब्रह्ममय इच्छाशक्ति के द्वारा प्रत्येक कार्य कर लेना सम्भव है इसीलिये प्राकृतिक नियम का उल्लंघन करने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता क्योंकि कर्ता और क्रिया एक ही वस्तु प्रतीत होती है।

अब तो प्रश्न केवल यही रह जाता है कि मनुष्य के हाथ में सुन्दर, साफ और स्पष्ट विवाह रेखा के होते हुए, और विवाह की इच्छा रखते हुए भी, क्यों अविवाहित रह जाता है या फिर यों कहिये कि सुन्दर, साफ, स्पष्ट रेखा के होते हुए भी उसे विवाह की इच्छा ही उत्पन्न क्यों नहीं होती। मेरी समझ में इसके दो ही कारण आते हैं। ये लेख भारत के प्रसिद्ध हस्तरेखा शास्त्री नितिन कुमार पामिस्ट द्वारा लिखा गया है अगर आप उनके दवारा लिखे सभी लेख पढ़ना चाहते है तो गूगल पर इंडियन पाम रीडिंग ब्लॉग को सर्च करें और उनके ब्लॉग पर जा कर उनके लिखे लेख पढ़ें । प्रथम तो विवाह कोई ऐसी वस्तु नहीं कि जिसका उपचार किसी के प्रेम द्वारा न हो सके अर्थात् वह मनुष्य अपने विवाह के समय को किसी प्रेयसी के प्रेम पाश में अपने को बाँधकर अपनी हार्दिक इच्छाओं तथा वासनाओं की तृप्ति करके टाल रहा हो यदि वासना तृप्ति का प्रत्यक्ष रूप न भी हो तो भी कोई न कोई और कुछ न कुछ बात अवश्य ही हृदय को आकर्षित करने के लिये प्रेममय अवश्य ही पाई जायगी। 

इस प्रकार कोई भी मनुष्य अपने अभीष्ट की सिद्धि को प्राप्त कर अपने मनोवांछित फल को पा लेता है अथवा हृदय रेखा के टूट जाने पर या किसी और दोष के उत्पन्न हो जाने पर कोई भी व्यक्ति किसी प्रतिज्ञा के अन्र्तगत अपनी प्रेयसी या प्रियतम से धोखा खाकर दूरस्थल पर उस समय की बाट में जबकि प्रेम ने परिचय देना है याद कर-करके उसके विचारों में प्रतिच्छाया को सजीव प्रतिमा का आभास लेकर वास्तविक विवाह के समय को टाल देता है और दोनों दीन से गये पाण्डे, हलुआ रहे न भाण्डे' की कहावत को चरितार्थ कर-करके पछताता है ।

दूसरी बात साथ में विशेष रूप से ध्यान देने योग्य यह है। कि प्रेक्षक विवाह रेखा पर जिन खड़ी रेखाओं को सन्तान रेखा समझकर सन्तान होना निश्चित करता है कभी-कभी अवरोध रेखाओं के रूप में प्रकट होकर विवाह रेखा का विरोध करती हैं । विवाह रेखा की बढ़ती हुई अग्रगति को रोकने वाली रेखा तथा ऊपर से नीचे तक काटने वाली रेखाएँ विवाह या प्रेम सम्बन्ध का विरोध करती हैं। ऐसी दशा में मनुष्य न प्रेम कर पाता है और न विवाह ही कर पाता है। 

इस प्रकार की अवरोध रेखाओं वाले हाथों को देखने से कितने ही हाथों से यह पता चला है कि उनमें से बहुत-सों के न तो प्रेम सम्बन्ध हुए और न विवाह ही हुए और कितने ही हाथों में इन रेखाओं के प्रभाव से विवाह तो न हुए किन्तु प्रेम सम्बन्ध हुए जिनमें कई सफल रहे और कई विफल भी रहे। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक रेखा की गतिविधि देखकर ही प्रेक्षक से बात करनी चाहिये।

दोहरी मस्तक रेखा और दोहरी हृदय रेखा | Double Head & Heart Line Palmistry

ज्योतिष शास्त्र में हाथ में दोहरी मस्तक रेखा और दोहरी हृद्या रेखा का विवरण | Double Head Line & Double Heart Line On Hand Palmistry
ज्योतिष शास्त्र में हाथ में दोहरी मस्तक रेखा और दोहरी हृद्या रेखा का विवरण | Double Head Line & Double Heart Line On Hand Palmistry
कभी कभी ऐसा भी देखने में आता है कि जिन मनुष्यों के हाथों में जीवन के प्रारम्भ से ही दोहरी मस्तक रेखा या दुहेरी हदय रेखा होती है वो अविवाहित ही रहते हैं। ये लेख भारत के प्रसिद्ध हस्तरेखा शास्त्री नितिन कुमार पामिस्ट द्वारा लिखा गया है अगर आप उनके दवारा लिखे सभी लेख पढ़ना चाहते है तो गूगल पर इंडियन पाम रीडिंग ब्लॉग को सर्च करें और उनके ब्लॉग पर जा कर उनके लिखे लेख पढ़ें । विचार करने पर पता चला कि दुहैरी शेष रेखा वाले व्यक्ति दार्शनिक प्रकृति के होते हैं। वे बचपन में चाहे जैसे भी रहे हो समझदार होते ही अपनी प्रगति रेखा को पलटकर आत्मचिंतन में लग जाते हैं और उनका हृदय संसार को असारता से उदास तथा नीरस हो जाता है इसलिये विवाह नहीं कर पाते। 

इसके अतिरिक्त जिन हाथों में दुहैरी हृदय रेखा होती है वे बड़े ही हिम्मती तथा मजबूत होते देखा गया है ऐसे व्यक्ति बड़े-बड़े पहलवान तथा डाकू आदि भी होते हैं जोकि अपनी शक्ति तथा ताकत को स्थिर रखने के लिये तथा दूसरों को नीचा दिखाने तथा पराजित करने के लिये विवाह बन्धन से दूर रहकर कसरत आदि कर शरीर को हुष्ट तथा पुष्ट रखते हैं या फिर वर्तमान में हम बोल सकते है की अधिक महत्वकांक्षी व्यक्ति जो अपने को कामयाब और सफल बनाने के लिए अविवाहित रहना पसंद करते है।  

आपको कुछ हस्तरेखा की पुस्तकों में दोहरी मस्तक रेखा और दोहरी हृदय रेखा पर राय भिन्न भिन्न मिलेगी जैसे कुछ विद्वान ये भी मानते है की दोहरी मस्तक रेखा वाला व्यक्ति बहुत विद्वान होता है और दोहरी मस्तक रेखा ज़्यदातर अविष्कार करने वालो के हाथो में ही होती है और दोहरी हृदय रेखा वाला व्यक्ति अधिक भावुक होता है और उस वजह से उसको जीवन भर धोखे ही मिलते है।  

हस्तरेखा शास्त्र में 5वी तरह की भाग्य रेखा | Bhagya Rekha Jyotish Hast Rekha Shastra

ज्योतिष शास्त्र में हाथ में दस प्रकार की भाग्य रेखा का विवरण | 10 Types Of Fate Line On Hand Palmistry

भाग्य रेखा की सीरीज में हम इस पोस्ट में पंचम प्रकार की भाग्य रेखा की बात करेंगे। आप बाकी की 1 से 10 तक की भाग्य रेखा का विवरण और उनका आपस में सम्बन्ध यहाँ पढ़ सकते है " हस्तरेखा " ।
पंचम भाग्य रेखा :--पंचम प्रकार की भाग्य रेखा वह कहलाती है। जोकि विशेष रूप से जीवन रेखा से ही निकलती है किन्तु इसके लिये कोई स्थान विशेष ही निर्धारित नहीं है ।
पंचम भाग्य रेखा :--पंचम प्रकार की भाग्य रेखा वह कहलाती है। जोकि विशेष रूप से जीवन रेखा से ही निकलती है किन्तु इसके लिये कोई स्थान विशेष ही निर्धारित नहीं है । यह भाग्य रेखा जीवन रेखा के किसी भी भाग से (शुक्र क्षेत्र से, राहु क्षेत्र से, या मंगल क्षेत्र से) अर्थात किसी भी क्षेत्र या स्थान से निकलकर ऊपर को जाती है। शीर्ष रेखा और हृदय रेखा को पार कर यदि यह भाग्य रेखा स्वाभाविक रूप से शनि क्षेत्र पर ठहर जाती है तो समयानुकूल शुभ फल प्रदान करती है । 

यदि यह रेखा मध्यमा उगली के प्रथम बन्द को स्पर्श करती हुई प्रथम, द्वितोय या तृतीय पोरुए तक पहुँच जाये तो अत्यन्त अशुभ फल प्रदान करती है । ऐसा मनुष्य गुणवान होने पर भी अपने गुणों का विकास नहीं कर पाता, उसके सभी गुण अन्य मनुष्यों के आश्रय से विकसित होते हैं। यदि उचित समय पर सहायता न मिली तो सभी गुण दबे से रहते हैं। और उस मनुष्य का जीवन चिन्तित तथा उदास ही बना रहता है। वह मानसिक क्लेश से सदा ही व्यथित रहता है। उसका प्रारम्भिक जीवन, सम्बन्धयों के अधीन ही व्यतीत होता है। सुन्दर भोजन तथा 'मुन्दर वस्त्र तक की कभी-कभी व्यवस्था नहीं होती । 

उसको अपना जीवन सुखमय बनाने के लिये अत्यन्त कठिन परिश्रम करना पड़ता है फिर भी वह सुख से नहीं रह पाता। कोई न कोई शारीरिक या 'मानसिक वेदना उसको दबाये ही रहती है। वह अपने गुणों को प्रशंसा का इच्छुक होता है किन्तु कहीं भी उचित पारितोषिक पाने के रहता है। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि वह अपने जीवन का उन्नति का मुख ही नहीं देख पाता। 

यदि उस मनुष्य को अपने पराली काल में किसी अच्छे व्यक्ति का सहयोग प्राप्त हो जाता है तो वह अपने प्रारम्भिक जीवन से ही उत्तरोत्तर उन्नति करता चला जाता है किन्त उसकी अपने पुरुषार्थ द्वारा उन्नति का श्रीगणेश उसी समय से होता है जब से यह भाग्य रेखा जीवन रेखा से पृथक् होकर अपना सीधा मार्ग ग्रहण करती है।

यह रेखा जितनी साफ, सुन्दर, पतली, गहरी तथा निर्दो होगी उतनी ही गुणों का विकास करने में समर्थ रहेगी। ऐसा मनष्य अपने जीवन के मध्य काल में उन्नति की ओर अग्रसर होता है । सौभाग्यवश यदि हाथ की बनावट उत्तम प्रकार की हुई, गुरु, शुक्र, सूर्य और बुध क्षेत्र उत्तम फलदायक हुए तो ऐसा मनुष्य उत्तम कोटि का कलाकर, चित्रकार, दस्तकार तथा व्यवहार कुशल व्यापार से (वाणिज्य) समुचित लाभ उठाने वाला होता है। उसको अपने कलापूर्ण कार्यों के लिये समुचित, यश, कीर्ति पारितोषिक तथा धन प्राप्त होता है। ये लेख भारत के प्रसिद्ध हस्तरेखा शास्त्री नितिन कुमार पामिस्ट द्वारा लिखा गया है अगर आप उनके दवारा लिखे सभी लेख पढ़ना चाहते है तो गूगल पर इंडियन पाम रीडिंग ब्लॉग को सर्च करें और उनके ब्लॉग पर जा कर उनके लिखे लेख पढ़ें । जिस प्रकार उसकी अवस्था प्रौढ़ होती जाती है उसी प्रकार उसकी क्रियाशीलता, परिश्रम, उद्योग, तथा पुरुषार्थ भी योग्यता के अनुसार प्रौढ़ तथा शुभ फलदायक होता जाता है। 

उसका भाग्य, उसके जीवन में शुभ घटनाओं का साथ देने लगता है और परिस्थिति उसके अनुकूल होकर उसके जीवन में चार चाँद लगा देती है और वह सुखमय जीवन व्यतीत करता है। किन्तु यदि यह भाग्य रेखा, जीवन रेखा से पृथक् होने के पश्चात् भी किसी प्रकार से दूषित हो रहे (जैसे भाग्य रेखा का लहर दार होना, द्वीपदार होना, टूट-टूटकर ऊपर को चढ़ना, शनि क्षेत्र पर पहुँचने से पहले ही मस्तक रेखा पर या हृदय रेखा पर या अचानक किसी भी स्थान पर ठहर जाना,) तो मस्तिष्क, हृदय प्रेम या उन्माद अथवा किसी दुर्घटना के कारण, उसके उन्नति न कर सकने व लक्षण है। 

प्रत्येक मनुष्य के उत्थान-पतन, उन्नति और ति का प्रत्यक्ष कारण उस मनुष्य के हाथ की निर्दोष तथा सदोष वाओं पर बहुत कुछ निर्भर है। प्रतिकूल अवरोध रेखाओं का टमा स्थान-स्थान पर काटते रहना, तथा और किसी प्रकार से विरोध प्रकट करते रहना, उन्नति के मार्ग में अड़चनें डालना ही प्रदर्शित करता है। इस प्रकार की भाग्य रेखा को हाथ में होना, गुरु जनों की, समाज तथा देश की सेवा का भाव उत्पन्न करने का प्रत्यक्ष लक्षण है। 

ऐसे लोग कष्टसाध्य जीवन व्यतीत करके भी परोपकार में रत रहते हैं। इनका परिश्रम तथा ईमानदारी इनको जीवन स्तर ऊँचा उठाने में बहुत कुछ सहायक होते हैं। इनके जीवन का अन्तिम चरण सुखमय व्यतीत होता है। इसमें सन्देह नहीं है ।


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