Monday, March 24, 2014



Hastrekha Gyan (Palmistry Marriage Lines)



    हस्तरेखा देखने के गुण व अधिकार   


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हस्तरेखा के भविष्यवक्ता को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि विश्लेषण के अनुसार जो रेखा बोल रही है उसी के अनुसार उस व्यक्ति को बतलावें। जो आपके पास आया है हल्का सा दुःखी है, वह आपका मार्गदर्शन चाहता है उसे वकील और डाक्टर की तरह उसे तसल्ली से बिठाकर प्रश्न पूछा जाय। कुछ कहने से पहले यह ध्यान रहे कि उसे कोई बात मनग-सजय़न्त न कही जाय। घातक और गिरावट वाले बिन्दु बतलाकर उसे बो-िहजयल न किया जाय मृत्यु, तलाक, दुर्घटना, आदि की भविष्यवाणी कभी नहीं करनी चाहिए। प्रारम्भ में यह भविष्यवाणी करना जटिल है तथा बाद में उचित नहीं है।  

  हाथ में अनेक जटिलताएँ हैं उन्हें आसानी से अध्ययन करना हो तो अभ्यास की आवश्यकता होती है। जो विशेषज्ञ होते हंै वे पहले काफी दिनों तक साथियों, मित्रों, परिजनों से मिलकर संलग्न घटनाओं का अध्ययन करके उन रेखाओं के बारे में दक्षता हासिल करते हैं तथा हमेशा अपने ज्ञान की ूूूपरीक्षा करते रहते हैं। चाहे पेशेवर हस्त रेखा विशेषज्ञ हों चाहे मनोविनोद के लिए, उच्च आदर्शों को लेकर चलना मूलभूत सिद्धान्त और निष्ठा के साथ कार्य करना सफलता की कुंजी है। ऐसे ज्ञान को किसी का नुकसान करने के लिए यदि कोई अपनाता है तो वह ज्ञान उसे ही नष्ट करता है और नुकसान पहुँचाता है।




Hastrekha Shastri (Palmistry In Hindi)



      हस्तरेखा विशेषज्ञ की आवश्यक सामाग्री



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हस्तरेखा देखने के लिए कुछ आवश्यक सामाग्री का संकलन होना चाहिए हस्तेरखा देखने के लिए कभी-ंउचयकभी अनेक रेखाओं का मिश्रण होता है ऐसी स्थिति में हाथ का चित्र लेकर उसे काफी समय तक अध्ययन करना होता है। कभी-ंउचयकभी पुस्तकों का भी सहारा लेना पड़ता है, इस कारण इन सामाग्रियों को रखना आवश्यक है। 1. आयताकार आवर्धक कांच, व स्प्रिट। 2. सफेद कागज आवश्यकतानुसार। 3. पेंसिल 4. डनलप, रबर के दो टुकड़े आयताकार (12ग22 सेमी. व आधा इंच मोटा)। 5. तारपीन तेल या हाथ का लोशन। 6. अच्छी रोशनी वाली छोटी टार्च। 7. गोल, 8. 12 इंच की पटरी (स्केल) रुई व -ंउचयकपड़ा व    

  हाथ की छाप लेने की विधि


हस्त रेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वे हस्त रेखा का अध्ययन व्यक्तिगत रुप से करें। कारण कि अंगूठे का लक्षण, छोटे निशान, नख, त्वचा की बनावट खुरदरापन व चिकनाहट, अंगुलियों की बनावट, रेखाएँ आदि लगातार बैठकर देखना कठिन हो जाता है। अतः हाथ का छाप लेकर उसका अध्ययन बाद में किया जाय, तो ज्यादा सही निर्णय पाया जा सकेगा तथा खरी भविष्यवाणी हो सकेगी।     1. पहली विधि हाथ की छाप लेने के लिए यह है कि पीतल या स्टील के गिलास में थोड़ा कपूर जलाएँ तथा जलते समय एक सफेद कागज को हाथ से पकड़कर उस पर धुएँ को लगने दें। जब यह पूरा कागज काला पड़ जाय, तो कागज को रबर पैड पर रखें और उसपर हाथ को रखकर दबा दें। हाथ एवं अंगुलियों के किनारे पेंसिल से रेखा खीचंे जिससे अंगुलियाँ एवं हाथ की आकृति आ सके। कागज के दूसरी ओर मेथीलेटेड स्प्रिट एक किनारे से डाल कर फैला दें और सुखा लें। अब आपके अध्ययन रेकार्ड के लिए यह कागज तैयार है कागज पर अगर कहीं कच्चा धुंआ होगा, जहां स्प्रिट नहीं गिरी होगी। उस स्थान को रुई से साफ कर दें। 2. दूसरी विधि में हाथ को सुखा कर, उस पर वेसलीन की बारीक तह लगा दी जाय। मुलायम ब्रश से रगड़कर उसे समान बना लिया जाय रबरपैड पर अलग रखे कागज पर हाथ को दबाया जाय। इस प्रकार जो अदृश्य हाथ की छाप आई। उसपर काॅपर आक्साइड फैला दी जाय। अब हाथ की रेखा स्पष्ट दिखायी देगी, इसके बाद चारकोल ड्राइंग्स से उसे पक्का बना लिया जाय।   


 3. एक अन्य विधि यह है कि 12 ग 22 सेमी. का इंकपैड लें साधारण इंक डालें तथा उस पैड पर इंक फैला कर हाथ पर समान रुप से लगाकर, एक अन्य सादे पैड पर बीच में रुई देकर उसपर कागज रखें और हाथ की छाप लगायें तथा जन्म तारीख, नख, आदि का विवरण लिखें। यदि व्यक्ति बायें हाथ से लिखने व काम करने वाला है तो उस कागज पर लेफ्ट हैण्डेड लिखें। वैज्ञानिक दृष्टि से यह ज्यादा उचित होगा कि दोनों हाथों की छाप ली जाय ताकि उसका तुलनात्मक अध्ययन किया जा सके। हाथ के अंगूठे की छाप उसी कागज पर अलग से ली जाय। हाथ की अंगुलियों के बारे में तथा हथेली के बाल यव अंगुलियों के मध्य जगह आदि के बारे में पूर्ण विवरण लिख लें।  



  अगर किसी विशेष कारण से आकस्मिक कहीं हाथ की छाप लेनी पड़े तो ऐसे में सामग्री उपलब्ध न हो तो लिपिष्टिक को हाथ पर लगाकार उसका इम्प्रेशन लिया जा सकता है। हाथ की छाप लेने के लिए विशेष प्रकार का कागज (वटरपेपर) बाजार में उपलब्ध होता है।




Hast Rekha Shastra Aur Aapka Bhagya In Hindi



हस्त रेखा और भविष्य 


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मानव जाति में कदाचित ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जो अपने अतीत का भलीभांति अध्ययन करने के बाद यह अनुभव न करता हो कि उसके विकसित जीवन के कितने वर्ष या कितना भाग उसके अपने और माता-ंउचयपिता के अनभिज्ञता के कारण बेकार ही बीत चुके हैं। अपने बारे में पूरा-ंउचयपूरा ज्ञान प्राप्त करने के बाद ही हम स्वयं को नियन्त्रित करने में सक्षम और समर्थ हो सकेंगे। साथ ही अपनी उन्नति करके मानव जाति की उन्नति कर सकेंगे। हस्त विज्ञान का स्वयं को पहचानने से सीधा सम्बन्ध है। इस विज्ञान की उत्पत्ति पर विचार करने के लिए हमें विश्व इतिहास के ूूू 11 प्रारम्भिक काल में लौटना होगा। 


आदि काल के मनीषियों का स्मरण करना होगा जिन्होंने विश्व के महान साम्राज्यों सभ्यताओं, जातियों और राजवंशों को नष्ट हो जाने के बाद भी अपने इस भण्डार को सुरक्षित रखा। विश्व इतिहास के प्रारम्भिक काल का अध्ययन करने पर हमें ज्ञात होगा कि हस्त विज्ञान से सम्बन्धित सामाग्री इन्हीं मनिषियों की धरोहर थी। सभ्यता के उस आदिकाल केा मानव इतिहास में आर्य सभ्यता के नाम से पुकारा जाता है। हस्त रेखा विज्ञान के मूल विन्दुओं को जांचते-ंउचयपरखते समय हमें प्रतीत होने लगता है कि हाथों की रेखाओं का यह विज्ञान विश्व के पुरातन विज्ञान में से एक है। इतिहास साक्षी है कि भारत के उत्तर-ंउचयपश्चिमी प्रान्तों की जोशी नामक जाति न जाने किस काल से हस्त रेखा विज्ञान को व्यवहार में लाती रही है। 


स्थूल या सूक्ष्म गतिविधि को संचालित करने वाले स्नायु जिनसे ठीक वैसी ही सलवटें या रेखाएँ बनती हैं। उनका निर्माण प्रमुखरूप से गतिशील देशों से होता है। लेकिन सम्भवतः उनमें कुछ अन्य ऐसे तन्तु भी होते हैं जो अर्जित या अन्र्तनिहित प्रवृत्तियों के मिश्रित प्रभावों का कम्पनों द्वारा सम्प्रेषण करते हुए और उनका जीवन रेखा के प्रभावित होने वाले भाग से मुख्य रेखा या उसकी शाखा के जोड़ पर क्राश चिह्न बनाते हुए दोनों का सम्बन्ध स्थापित करते हैं। कुछ कोशिकाओं की ऐसी वृत्ति है जिनके कारण उनमें आगामी घटनाओं का प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। शायद कम्पन्न उत्पन्न हो जाता है। कोशिकाओं में उत्पन्न कम्पन्न अपने साथ जुड़े तर्क प्रक्रियाओं में लगे कोणों में कोई गतिविधि तो उत्पन्न नहीं करवा सकता लेकिन उनमें चेतनात्मक कम्पन्न अवश्य जगा देता है और इन कम्पनों का सम्पे्रषण हाथ पर बने विभिन्न आकार-ंउचयप्रकार के चिह्नों के साथ में अंकित हो जाता है। 

एक तर्कयुक्त जीवन के रुप में मनुष्य का हाथ विशेष रुप से विकाश की उच्च स्थिति का द्योतक है। उसकी गति से क्रोध प्रेम आदि प्रवृत्तियों का ज्ञान होता है। यह गति स्थूल अथवा सूक्ष्म होती है, इसलिए उससे हाथं पर बड़ी या छोटी सलवटें या रेखाएं बनती है।  चिकित्सा विज्ञान से कान का रक्त अर्बुद काफी समय पहले जाना जा चुका है, यह कान के ऊपरी भाग में विभिन्न आकार में बनता है, यह फिर उपरी भाग के फूल जाने से उसी की शक्ल में बन जाता है। जिसमें रक्त अर्बुद होता है, यह अर्बुद अक्सर पागलों के कान में ही बनता है सामान्य रुप से उन लोगों के कान में जिनका पागलपन पैतृक होता है। इस बात का विशेष अध्ययन पेरिस में किया गया। विज्ञान अकादमी के तमाम परीक्षणों के जो परिणाम निकले उनसे सिद्ध हो गया कि केवल कान की परख करके वर्षो पहले भविष्यवाणी की जा सकती है। इसलिए यह तर्क सिद्ध हो चुका है कि जब केवल कान की जांच-ंउचयपरख करके सही-ंउचयसही भविष्यवाणी की जा सकती है, तो क्या हाथों का निरीक्षण करके अन्य भविष्यवाणी करना असम्भव है? हाथ के विषय में स्नायु मण्डल और उनके गति संचालन को देखते हुए यह माना जा चुका है कि हाथ ही पूरे मानव शरीर का सर्वाधिक विचित्र अंग है, और हाथ का मस्तिष्क के साथ सबसे ज्यादा गहरा सम्बन्ध है। किन्हीं दो हाथों पर अंकित रेखाएं और चिह्न कभी भी एक जैसे नहीं पाये जाते। इसके अलावा जुड़वा बच्चों की हस्तरेखा में भी परस्पर अन्तर पाया जाता है। 


यह भी पाया गया है कि हाथ की रेखाएँ किसी परिवार की किसी विशिष्ट प्रवृत्ति केा स्पष्ट कर देती है और आने वाली पी-िसजय़यों में यह प्रवृत्ति निरन्तर बनी रहती है, लेकिन यह भी देखा गया है कि कुछ बच्चों के हाथ पर अंकित रेखाओं की स्थिति में अपने माता-ंउचयपिता से कोई समानता नहीं होती। अगर गहराई से अध्ययन किया जाय, तो इस सिद्धान्त के अनुसार वे बच्चे अपने माता-ंउचयपिता से पूरी तरह भिन्न होते हैं। एक प्रचलित धारणा है कि हाथ की रेखाओं पर व्यक्ति के कार्यों का गहरा प्रभाव पड़ता है। वे उनके अनुसार ही चलती रहती हैं। लेकिन सच्चाई इसके विल्कुल विपरीत है, शिशु के जन्म के समय ही उसके हाथ की चमड़ी मोटी और कुछ सख्त हो जाती है, अगर व्यक्ति के हंथेली की चमड़ी को पुल्टिस या किसी अन्य साधनों से मुलायम बना दिया जाये तो उसपर अंकित चिह्न किसी भी समय देखे जा सकते हैं। इनमें अधिकांश चिह्न उसकी हथेली पर जीवन के अंतिम क्षण तक बने रहते हैं। 13 इस संदर्भ में हाथ में विद्यमान कोषाणुओं पर ध्यान देना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मैरनर ने अपनी पुस्तक हाथ की रचना और विधान में लिखा है कि हाथ के इन कोषाणुओं का अर्थ बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह अद्भुत आणविक पदार्थ अंगुलियों की पोरों में और हाथ की रेखाओं में पाये जाते हैं, तथा कलाई तक पहुंचते पहुँचते-ंउचय2 लुप्त हो जाते हैं। यह शरीर के जीवित रहने की अवधि में कुछ विशेष कम्पन्न भी उत्पन्न करते हैं तथा जैसे जीवन समाप्त होता है यह रुक जाते हैं। 



अब हम हाथों की चमड़ी, स्नायु और स्पर्श करने की अनुभूति पर ध्यान देते हैं। सर चाल्र्सवेल ने चमड़ी के सम्बन्ध में लिखा है-ंउचय चमड़ी त्वरित स्पर्श अनुभूति का महत्त्वपूर्ण अंश है। यही वह माध्यम है जिसके द्वारा बाहरी प्रभाव हमारे स्नायुओं तक पहुंचते हैं। उंगलियों के सिरे इस अनुभूति की व्यवस्थाओं का श्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं। नाखून उंगलियों को सहारा देते हैं और लचीले गद्दे के प्रभाव को बनाये रखने के लिए ही उसके सिरे बने हैं। उनका आकार चैड़ा और -सजयालनुमा है। यह बाहरी उपकरणों का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। इसकी लचक और भराव इसे प्रशंसनीय -सजयंग से स्पर्श के अनुकूल -सजयालते हैं। यह एक अद्भुद् सत्य है कि हम जीभ से नाड़ी नहीं देख सकते, लेकिन उंगलियों से देख सकते हैं। गहराई से निरीक्षण करने पर हमें मालूम होता है, उंगलियों के सिरों में उन्हें स्पर्श के अनुकूल -सजयालने के लिए उनका विशेष प्रावधान है। जहां भी अनुभूति की आवश्यकता अधिक स्पष्ट होती है, वहीं हमें त्वचा की छोटी-ंउचयछोटी घुमावदार मेड़ें-ंउचयसी महसूस होती हैं। इन मेड़ों की इस अनुकूलता में आन्तरिक सतह पर दबी हुई प्रणालिकाएं होती हैं जो पौपिला कहलाने वाली त्वचा की कोमल और मांसल प्रक्रियाओं को टिकाव और स्थापन प्रदान करती हैं। जिनमें स्नायुओं के अन्तिम सिरों का आवास होता है। इस प्रकार स्नायु पर्याप्त सुरक्षित होते हैं और साथ ही साथ इतने स्पष्ट भी दिखाई देते हैं कि लचीली त्वचा द्वारा उन्हें सम्पेषित प्रभावों को ग्रहण कर सकें और इस प्रकार स्पर्श अनुभूति को जन्म दे सकें।




Hastrekha Vigyan (Online Palm Reading)



हस्तरेखा विज्ञान विज्ञान की सत्यता

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किसी विषय के बारे में तभी विश्वास होता है, जब उसे अंतरात्मा द्वारा देख या सम-हजय लिया जाय। एक अणु को भी अपने अस्तित्व में अध्ययन के अयोग्य ठहराना उचित नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति यह धारणा बना ले कि हस्त विज्ञान विचारणीय विषय नहीं है तो यह उसका कोरा भ्रम होगा। क्योंकि अनेक बड़ी-ंउचयबड़ी अत्यन्त महत्वपूर्ण सच्चाइयां और वास्तविकताएं जिन्हें कभी नगण्य सम-हजया जाता था वे अब असीमित शक्ति का साधन बन गयी हैं।

हस्तविज्ञान के अध्ययन में और उसे विकसित करने में अनेक दार्शनिक और वर्तमान काल के वैज्ञानिकों ने भी इस ओर ध्यान दिया है। जब हम मनुष्यों की क्रियाशीलता और उसके पूरे शरीर पर प्रभाव के बारे में विचार करते हैं तो यह जानकर आश्चर्य नहीं होता, कि जिन्हे वैज्ञानिकों ने पहले प्रमाणित किया था कि मानव मस्तिष्क और उसके हाथों के बीच जितने भी स्नायु हैं, उतने शारीरिक व्यवस्था में और कहीं भी नहीं हैं। मनुष्य जब हाथों से कुछ करता है तो मस्तिष्क भी सोंचना आरम्भ कर देता है। भिन्न-ंउचयभिन्न प्रकार के स्वभाव, संस्कार, प्रकृति और मानसिक स्थिति के व्यक्तियों के हाथों में भिन्न-ंउचयभिन्न अन्तर होता है।  


संसार में अनेक आश्चर्यजनक सच्चाइयां हैं, शताब्दियों के कालचक्र ने इस विज्ञान पर धूल जमा दी थी लेकिन मानव के विवेक ने उसे पुनः खोज निकाला और अब इस विज्ञान की सच्चाई पर विश्वास होने लगा है। यह प्रमाणित हो गया है कि हाथ की रेखाएँ एक ऐसा अमिट सत्य है जो व्यक्ति के जीवन और उसकी प्रकृति को स्पष्ट रुप से प्रकट कर देती है। आज भौतिक युग में जो लोग इस विज्ञान की सच्चाई के प्रभाव को जानना चाहते हैं। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि हमें यह विज्ञान शताब्दियों पूर्व प्राप्त हुआ था और वह विज्ञान आज भी अभीष्ट सिद्ध है।  




Saral Hast Rekha Shastra (Read Palm Online)



हस्त रेखा की उत्पत्ति और इतिहास 


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जिन मनीषियों ने हस्तविज्ञान की खोज की, उसे सम-हजया और व्यवहारिक रूप दिया, उनकी विद्वता के ठोस प्रमाण आज भी मौजूद हैं। भारत के ऐतिहासिक युग के स्मारक हमें बताते हैं कि रोम और यूनान की स्थापना से वर्षों पूर्व इस देश के मनीषियों ने ज्ञान का इतना अमूल्य भण्डार एकत्र कर लिया था कि उसकी सराहना समूचे विश्व में हुआ करती थी, और इन्हीं विद्वानों में हस्त रेखा विज्ञान के जन्म दाता भी थे, उन्ही के बनाये हुए सिद्धान्त अन्य देशों में पहुँचे। हस्तरेखा से सम्बन्धित अब तक जितने भी प्राचीन ग्रंथ पाये गये हैं उनमें वेद एवं सामुद्रिक शास्त्र सबसे प्राचीन धर्म ग्रंथ है। यही वेद और शास्त्र यूनानी सभ्यता और ज्ञान का मूल श्रोत था। अत्यन्त प्राचीन युग में इस विज्ञान का प्रचलन चीन, तिब्बत, ईरान, और मिश्र जैसे देशों में आरम्भ हुआ लेकिन इन देशों में इसमें जो सहयोग स्पष्टता और एकरूपता हमें दिखायी देती है वह वास्तव में भारतीय सभ्यता की देन है। संसार भर में भारतीय सभ्यता को सर्वाधिक उच्च और विवेक पूर्ण माना जाता रहा है। जिसे हम हस्त रेखा विज्ञान या कीरोमेंसी कहते हैं वह भारत के अलावा यूनान में भी पला और पनपा यूनानी शब्द कीर का अर्थ है, जो हाथ से विकसित हुआ हो।

उन्नीसवीं शताब्दी में उत्पीड़न की अग्नि में भी सुरक्षित रहकर फीनिक्स ने इस ज्ञान की सुरक्षा के निरन्तर प्रयास किये और जिस विज्ञान को अन्धविश्वास घोषित किया जा चुका था, वह एक बार फिर सत्य बनकर सामने आया। इस प्रकार के अनेक प्रमाण हैं जो इसकी सत्यता को साबित करते हैं कि यह एक सत्य और प्रमाणिक विज्ञान है। ईशा से 423 वर्ष पूर्व यूनानी दार्शनिक एनेक्सागोरस कीरोमेंन्सी का उपयोग ही नहीं बल्कि शिक्षा भी देता था। इन्ही की तरह अरस्तू विलसाइड, कार्डमिस, पिल्लनी थे, जो हिस्पेनस को इस विज्ञान पर एक पुस्तक लिखकर भेंट की थी, उसमें लिखा था-ंउचय यह ग्रन्थ एक ऐसा अध्ययन है जो जिज्ञासु और सुविकसित मस्तिष्क वाले व्यक्ति के प-सजय़ने योग्य है। इन विद्वानों ने जब मानव का अध्ययन किया तो मानव के चेहरे उसकी नाक, कान, आँख आदि की स्वाभाविक स्थिति भली भांति पहचान लिया। इसी प्रकार मानव की हथेली में बनी मस्तिष्क रेखा और जीवन रेखा की जानकारी प्राप्त करके उनकी स्वाभाविक स्थिति को मान्यता प्रदान की। इस विज्ञान की खोज और अध्ययन में उन विद्वानों ने जो साधना की, जो समय लगाया उसी के कारण वे हथेली की रेखाओं और चिह्नों को ये नाम दे सकें। जिस रेखा को मानसिकता का सम्बन्धी सम-हजया उसे मस्तिष्क रेखा का नाम दिया। स्नेह से सम्बधित रेखा को हृदय रेखा तथा जीवन की अवधि से सम्बन्धित रेखा को जीवन रेखा का नाम दिया इसी प्रकार चिह्न और पर्वत के भी उन्हीं के अनुरुप नाम दिये।








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