Hath Mein Rahu Aur Ketu Ka Prabhav
राहु पर्वत
हाथ में राहु पर्वत का स्थान मस्तिक रेखा के नीचे तथा शुक्र व् चंद्र पर्वत के बीच में होता है । भाग्य रेखा इस ही पर्वत से होकर सनी पर्वत पर जाती है ।
*यदि हाथ में राहु पर्वत विकसित हो तो ये जातक भाग्यवान होते । इनका मन धार्मिक प्रवर्ति का होता है ।
इनकी समाज में अच्छी मान प्रतिष्ठा होती है ।
*यदि हाथ में राहु पर्वत विकसित हो और जातक की राहु पर्वत पर भाग्य रेखा टूटी हुई हो इस तरह के जातक जीवन में एक बार जरूर ऊपर उठते है और फिर वे गलत कार्यो में आकर अपनी संपत्ति गवा देते है ।
* यदि यह पर्वत हतेली के मध्य में होता है तो ये जातक अपने यौवन समय में गलत कार्यो में पड़कर अपने जीवन में बदनाम हो जाते है । यदि राहु पर्वत का हतेली में आभाव है और भाग्य रेखा राहु पर्वत पर आकर टूट गयी हो तो ये जातक अपने यौवन काल को भिकारी की तरह व्यतीत करते है ।
प्राचीन भारतीय हस्तरेखा शास्त्र इन पर कोई विशेष प्रकाश नहीं डालता है। आधुनिक विद्वान इनका अवश्य समर्थन करते हैं। विद्वानों में हथेली में इनकी स्थिति को लेकर प्राय: मतभेद हैं। कुछ विद्वान राहु की स्थिति मंगल मैदान के पास मस्तिष्क रेखा के नीचे मानते हैं जबकि कुछ मणिबंध से ऊपर शुक्र एवं चंद्र के संधि स्थल के पास लेकिन हमारा अनुभव एवं विचार है कि राहु की स्थिति मस्तिष्क रेखा के नीचे मंगल मैदान में ही है।
कुछ विद्वानों का राहु पर्वत को ले कर भिन्न मत है जैसे उनका मानना है की हथेली में इस पर्वत का क्षेत्र ठीक बीचों बीच, मस्तिष्क रेखा के नीचे, मंगल तथा शुक्र पर्वत के पास माना गया है। भाग्य रेखा इसी पर्वत से होकर शनि पर्वत तक जाती है। राहु का जो क्षेत्र माना गया है अगर वह अत्यन्त पुष्ट और उन्नत है तब ऎसा व्यक्ति निश्चित रूप से भाग्यवान होता है। इसी पुष्ट पर्वत पर से भाग्य रेखा स्पष्ट तथा गहरी होकर अगर आगे बढ़ती है तब ऎसा व्यक्ति जीवन में परोपकारी, प्रतिभावान, धार्मिक तथा सभी प्रकार से सुख भोगने वाला होता है। यदि हथेली में भाग्य रेखा टूटी हुई है पर राहु पर्वत विकसित है तब ऎसा व्यक्ति एक बार आर्थिक दृष्टि से बहुत अधिक ऊँचा उठ जाता है लेकिन फिर बाद में उसका पतन हो जाता है।
यदि किसी हाथ में यह पर्वत अपने स्थान से हटकर हथेली के मध्य की ओर सरक जाता है तो उस व्यक्ति को यौवनकाल में बहुत अधिक बुरे दिन देखने को मिलते हैं। यदि हथेली के बीच का हिस्सा गहरा हो और उस पर से भाग्य रेखा टूटी हुई आगे बढ़ रही है तब वह व्यक्ति यौवनकाल में भिखारी के समान जीवन व्यतीत करता है। यदि राहु पर्वत कम उभरा हुआ है तब ऎसा व्यक्ति चंचल स्वभाव का तथा अपने ही हाथों में अपनी संपत्ति का नाश करने वाला होता है।
केतु पर्वत अथवा केतु क्षेत्र- हथेली में राहु के ठीक सामने 180 डिग्री पर केतु की स्थिति होती है । मणिबंध से ऊपर शुक्र और चंद्र पर्वत के मध्य केतु का स्थान होता है। भाग्य रेखा अधिकतर यहाँ से उदित चक के बचपन से लेकर युवावस्था तक भाग्य को प्रभावित करता है। यदि यात स्थिति में हो और भाग्य रेखा भी अच्छी हो तो व्यक्ति अभावों में को क लेता है। इसके विपरीत यदि केतु अतिवकसित स्थिति में ही वकत हो तो व्यकि अभाव ग्रस्त हो सकता है। उसका बचपन दरिद्रता में बीतता है ।
हथेली में इस पर्वत का स्थान मणिबन्ध के ऊपर शुक्र तथा चन्द्र क्षेत्रों को बांटता हुआ भाग्य रेखा के प्रारंभिक स्थान के समीप होता है। इस पर्वत का फल राहु पर्वत की तरह ही देखा जाता है। केतु का प्रभाव जीवन में पाँचवें वर्ष से लेकर बीसवें वर्ष तक देखा जाता है। यदि यह पर्वत स्वाभाविक रूप से उन्नत एवं पुष्ट होता है तथा भाग्य रेखा भी स्पष्ट तथा गहरी हो तो वह व्यक्ति भाग्यशाली होता है तथा अपने जीवन में समस्त प्रकार के सुखों का भोग करता है।
ऎसा बालक गरीब घर में जन्म लेकर भी अमीर होते देखा गया है। यदि किसी के हाथ में यह पर्वत अस्वाभाविक रुप से उठा हुआ हओ और भाग्य रेखा कमजोर है तब उसे बचपन में बहुत अधिक बुरे दिन देखने पड़ते हैं। उसके घर की आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है और शिक्षा पाने के लिए भी ऎसे बालक को काफी ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऎसा बालक बचपन में बीमार भी होता है।
यदि केतु पर्वत अविकसित हो और भाग्य रेखा भी प्रबल हो फिर भी उसके जीवन से गरीबी मिटती नहीं है। अत: केतु पर्वत के विकसित होने के साथ भाग्य रेखा भी स्पष्ट और विकसित हो तभी व्यक्ति जीवन में पूर्ण रुप से उन्नति कर सकता है।
केतु का क्षेत्र या पर्वत हथेली के मूल भाग में मणिबंध से ऊपर शुक्र और चंद्र क्षेत्रों के बीच भाग्य रेखा के समीप होता है। इस क्षेत्र का प्रभाव लगभग राहु के सदृश ही होता है। पर इसका अनुकूल या प्रतिकूल जो भी प्रभाव पड़ता है वह जीवन काल के पाँचवें वर्ष से बीसवें वर्ष तक ही।
राहु के साथ यह केतु की भिन्नता है, क्योंकि राहु जीवन के किसी भी अवस्था को प्रभावित करता है। यदि यह क्षेत्र स्वाभाविक रूप से विकसित हो, भाग्य रेखा भी सुस्पष्ट हो तो ऐसे जातक परम भाग्यशाली, जीवन के समस्त प्रकार का सुखोपभोग करनेवाला होता है।
ऐसे जातक गरीब के घर जन्म लेकर भी अमीर होते हैं या ऐसे ही जातक के जन्म लेने से उस परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरने लगती है। यदि यह क्षेत्र अस्वाभाविक रूप से उभरा हो, भाग्य रेखा भी अच्छी न हो तो जातक का बालपन पाँचवें से बीसवें वर्ष तक का समय काफी बुरा होता है। इस अवधि में उसके परिवार की स्थिति अच्छी नहीं रह जाती है। शिक्षा-दीक्षा में भी काफी बाधाएँ सामने आती हैं।
शरीर से भी उक्त अवधि में जातक कमजोर होता है। यदि यह क्षेत्र अविकसित हो तो अच्छी भाग्य रेखा के बावजूद भी जीवन में अर्थाभाव नहीं मिटता। अतः केतु क्षेत्र एवं भाग्यरेखा का सुस्पष्ट होना ही सुखमय जीवन का प्रतीक है।
3. Wear 8 mukhi Rudraksh in neck.
4. Donate urad daal, and black til (sesame).
5. Give sugar to ants.
6. Take alcohol (wine, brandy or rum, etc) bottle with some uncooked rice in it. Keep the bottle in South West direction of the house on the eve of new moon day (Amavasya) and on the night of new moon day (amavasya) take this bottle to a place where four roads meet (chauraha) and smash the bottle there and return back to home.
नितिन कुमार पामिस्ट





