Hath Mein Rahu Aur Ketu Ka Prabhav


Hath Mein Rahu Aur Ketu Ka Prabhav


rahu aur ketu ka isthan hath mein राहु और केतु  हालाँकि ग्रह माना है लेकिन इनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है । ये केवल गणित्य बिंदु है । इनको छाया ग्रह माना गया है परंतु ये अपना प्रभाव अवश्य डालते है ।

राहु और केतु हालाँकि ग्रह माना है लेकिन इनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है । ये केवल गणित्य बिंदु है । इनको छाया ग्रह माना गया है परंतु ये अपना प्रभाव अवश्य डालते है ।

राहु पर्वत
प्राचीन भारतीय हस्तरेखा शास्त्र इन पर कोई विशेष प्रकाश नहीं डालता है। आधुनिक विद्वान इनका अवश्य समर्थन करते हैं। विद्वानों में हथेली में इनकी स्थिति को लेकर प्राय: मतभेद हैं। कुछ विद्वान राहु की स्थिति मंगल मैदान के पास मस्तिष्क रेखा के नीचे मानते हैं जबकि कुछ मणिबंध से ऊपर शुक्र एवं चंद्र के संधि स्थल के पास लेकिन हमारा अनुभव एवं विचार है कि राहु की स्थिति मस्तिष्क रेखा के नीचे मंगल मैदान में ही है।

हथेली में राहु पर्वत का पुष्ट एवं उन्नत होना व्यक्ति को सफल एवं भाग्यवान बनाता है अथवा दूसरे अर्थ में कहें तो हथेली भरी होने पर व्यक्ति सफल व भाग्यवान होता है। राहु क्षेत्र नीचा अर्थात् हथेली में गड़ा होने पर व्यक्ति भाग्यहीन एवं असफल होता है तथा मेहनत | करने पर भी इच्छित सफलता प्राप्त नहीं होती है।

व्यक्ति के भाग्य एवं सफलता को नियंत्रित एवं निर्धारित करने में राहु की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है । राहु के सहयोग के बिना भाग्य की उचित प्राप्ति संभव नहीं है । इसी कारण अधिकांश हाथों में भाग्य रेखा राहु क्षेत्र पर आकर टूट जाती है अथवा उसकी दिशा प्रभावित हो जाती है।

अत्यधिक विकसित राहु होने एवं भाग्य रेखा के पीड़ित या खण्डित होने पर व्यक्ति की आर्थिक समृद्धि के स्तर का उत्थान-पतन होता है।

हथेली में गड़ा होने अथवा राहु के अविकसित होने से व्यक्ति अपने गलत निर्णयों से अपनी धन सम्पति को गंवा देता है।

केतु पर्वत
हथेली में राहु के ठीक सामने 180 डिग्री पर केतु की स्थिति होती है । मणिबंध से ऊपर शुक्र और चंद्र पर्वत के मध्य केतु का स्थान होता है। भाग्य रेखा अधिकतर यहाँ से उदित चक के बचपन से लेकर युवावस्था तक भाग्य को प्रभावित करता है। यदि यात स्थिति में हो और भाग्य रेखा भी अच्छी हो तो व्यक्ति अभावों में को क लेता है। इसके विपरीत यदि केतु अतिवकसित स्थिति में ही वकत हो तो व्यकि अभाव ग्रस्त हो सकता है। उसका बचपन दरिद्रता में बीतता है ।

राहु केतु पर पाए जाने वाले चिह्न :

1. एक खड़ी रेखा हो तो व्यक्ति साहसी एवं उत्साही होता है।
2. दो खड़ी रेखा हो तो व्यक्ति में साहस उग्रता की हद तक होता है।
3. बिन्दु हो तो सफलता प्रदान करता है।
4. कोंस हो तो पद प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाता है।
5. वर्ग हो तो राज-काज में सफलता एवं सम्मान मिलता है।
6. वृत हो तो प्रतिद्वंदियों में सफलता अथवा सैन्य सेवा में हो तो उच्च ओहदा।
7. जाल हो तो धन-सम्पति का अभाव एवं कमजोर आर्थिक स्थिति |

Rahu Remedies For Ill-Health, Bad Luck, Evil Eye, & Conspiracies



1. Hang or place Rahu Yantra in South West direction of your house on Saturday.    2. Wear Gomed (black hessonaite) in silver ring, in middle finger, on Saturday.


1. Hang or place Rahu Yantra in South West direction of your house on Saturday.

2. Wear Gomed (black hessonaite) in silver ring, in middle finger, on Saturday.

3. Wear 8 mukhi Rudraksh in neck.

4. Donate urad daal, and black til (sesame).


5. Give sugar to ants.

6. Take alcohol (wine, brandy or rum, etc) bottle with some uncooked rice in it. Keep the bottle in South West direction of the house on the eve of new moon day (Amavasya) and on the night of new moon day (amavasya) take this bottle to a place where four roads meet (chauraha) and smash the bottle there and return back to home. 


केतु क्षेत्र  (Dragon's tail)




केतु का क्षेत्र या पर्वत हथेली के मूल भाग में मणिबंध से ऊपर शुक्र और चंद्र क्षेत्रों के बीच भाग्य रेखा के समीप होता है। इस क्षेत्र का प्रभाव लगभग राहु के सदृश ही होता है। पर इसका अनुकूल या प्रतिकूल जो भी प्रभाव पड़ता है वह जीवन काल के पाँचवें वर्ष से बीसवें वर्ष तक ही।

राहु के साथ यह केतु की भिन्नता है, क्योंकि राहु जीवन के किसी भी अवस्था को प्रभावित करता है। यदि यह क्षेत्र स्वाभाविक रूप से विकसित हो, भाग्य रेखा भी सुस्पष्ट हो तो ऐसे जातक परम भाग्यशाली, जीवन के समस्त प्रकार का सुखोपभोग करनेवाला होता है।

ऐसे जातक गरीब के घर जन्म लेकर भी अमीर होते हैं या ऐसे ही जातक के जन्म लेने से उस परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरने लगती है। यदि यह क्षेत्र अस्वाभाविक रूप से उभरा हो, भाग्य रेखा भी अच्छी न हो तो जातक का बालपन पाँचवें से बीसवें वर्ष तक का समय काफी बुरा होता है। इस अवधि में उसके परिवार की स्थिति अच्छी नहीं रह जाती है। शिक्षा-दीक्षा में भी काफी बाधाएँ सामने आती हैं।

शरीर से भी उक्त अवधि में जातक कमजोर होता है। यदि यह क्षेत्र अविकसित हो तो अच्छी भाग्य रेखा के बावजूद भी जीवन में अर्थाभाव नहीं मिटता। अतः केतु क्षेत्र एवं भाग्यरेखा का सुस्पष्ट होना ही सुखमय जीवन का प्रतीक है।


नितिन कुमार पामिस्ट



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