Sunday, March 11, 2018

हस्तरेखा शास्त्र में 9वी तरह की भाग्य रेखा | Bhagya Rekha Jyotish Hast Rekha Shastra

ज्योतिष शास्त्र में हाथ में दस प्रकार की भाग्य रेखा का विवरण | 10 Types Of Fate Line On Hand Palmistry

भाग्य रेखा की सीरीज में हम इस पोस्ट में नवम प्रकार की भाग्य रेखा की बात करेंगे। आप बाकी की 1 से 10 तक की भाग्य रेखा का विवरण और उनका आपस में सम्बन्ध यहाँ पढ़ सकते है " हस्तरेखा " ।
 हस्तरेखा शास्त्र में 8 वी तरह की भाग्य रेखा | भाग्य रेखा ज्योतिष हस्त रेखा शास्त्र
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हस्तरेखा शास्त्र में 9 वी तरह की भाग्य रेखा | भाग्य रेखा ज्योतिष हस्त रेखा शास्त्र 


नवम भाग्य रेखा :–नवम प्रकार की भाग्य रेखा वह कहलाती है। जोकि चन्द्र क्षेत्र (चित्र देखे १) के किसी भी स्थान से निकलकर राहु क्षेत्र को होती हुई, मस्तक रेखा को पार कर हृदय रेखा से निकल, शनि क्षेत्र में प्रवेश करती है। यदि वह रेखा शनि प्रदेश में पहुँचकर सर्प जिह्वाकर हो जाय तो मनुष्य के लिए शुभ फलदायक होता है। ऐसे लक्षणों से युक्त मनुष्य एक ही समय में दो मार्गों से धन कमाने वाला होता है। यदि इस भाग्य रेखा की एक शाख गुरु प्रदेश को जाती हो तो वह मनुष्य अपने शुभ विचारों द्वारा, शुभ कलापूर्ण कृतियों से धन और यश कमायेगा । ये लेख भारत के प्रसिद्ध हस्तरेखा शास्त्री नितिन कुमार पामिस्ट द्वारा लिखा गया है अगर आप उनके दवारा लिखे सभी लेख पढ़ना चाहते है तो गूगल पर इंडियन पाम रीडिंग ब्लॉग को सर्च करें और उनके ब्लॉग पर जा कर उनके लिखे लेख पढ़ें । वह निश्चय ही धर्म-कर्म करने वाला, कोमल स्वभाव, परोपकारी तथा दोनों का रक्षक होता है। वह सत्यवक्ता होने के कारण सर्वत्र ही पूजा जाता है।

परिस्थिति तथा योग्यता के अनुसार वह समाज, देश, जाति, वंश और पड़ोस आदि में विशेष सम्मान का अधिकारी होता है और जो रेखा रवि क्षेत्र को जाती है वह प्रदर्शित करती है कि ऐसा मनुष्य किसी व्यापार, या कलापूर्ण कार्यों में विशेष रूप से सफलता पायेगा । ये रेखाएँ जितनी सुन्दर, साफ और स्पष्ट होंगी उतनी ही यशस्वी धन-सम्पत्ति सम्बन्धी सफलता उसको प्राप्त होंगी और जितनी ट्टी, लहरदार, टेढ़ी-मेढ़ी, द्वीपदार या किसी और प्रकार से दूषित होने पर ये दोनों ही दूषित फलदायक होती जाती हैं । गुण-अवगणों में। बदल जाते हैं और यश के स्थान पर अपयश की प्राप्ति होने लगती है। 

यदि यह भाग्य रेखा शाखा रहित होकर सीधी मध्यमा बन्द को स्पर्श करती हो या ऊपर पोरुओं पर चढ़ रही हो तो अत्यन्त दूषित फल प्रदान करती है। ऐसा मनुष्य कुचरित्र हो जाता है और अपयश को प्राप्त होता है और वह एक दुखित जीवन व्यतीत करता है। इसके प्रतिकूल यदि यह रेखा सुन्दर, साफ, स्पष्ट, पतली औरग हरी होकर अपने स्वाभाविक रूप से शनि क्षेत्र पर जाती हो तो निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि ऐसी भाग्य रेखा वाला पुरुष किसी स्त्री के और स्त्री किसी पुरुष के सम्बन्ध में आने के पश्चात् ही अपने-अपने उन्नति के मार्ग को उत्तरोत्तर उन्नत बनाते हैं । 

यह उन्नति उनकी स्थाई और अस्थाई दोनों प्रकार की अपने गुण, कर्म तथा स्वभाव या सहायक रेखाओं की सहायता पर बहुत कुछ निर्भर होती है। इस भाग्य रेखा से युक्त मनुष्य स्वतन्त्र विचारों वाले नहीं होते। उनका मन चंचल; तथा बुद्धि स्थिर नहीं होती जिस कारण वे अपना कोई कार्य समय पर नहीं कर पाने । ये लोग वायदे के पक्के नहीं होते। ये लेख भारत के प्रसिद्ध हस्तरेखा शास्त्री नितिन कुमार पामिस्ट द्वारा लिखा गया है अगर आप उनके दवारा लिखे सभी लेख पढ़ना चाहते है तो गूगल पर इंडियन पाम रीडिंग ब्लॉग को सर्च करें और उनके ब्लॉग पर जा कर उनके लिखे लेख पढ़ें । 

ये लोग अच्छ कलाकार, गायक शास्त्रीय संगीत में विशारद, वाद्य प्रवीण, चित्रकार, 'वक, कवि, मवक्ता, मूत बनाने वाले इत्यादि शुभ गुणों से युक्त होते हैं। इनकी भाषा बड़ी ही कोमल, सुमधुर और रसिक होती है। जिसमें अश्लीलता और प्रेम का सम्मिश्रण विशेष रूप से पाया जाता है । इनका जीवन विषय वासनाओं से पूर्ण; अधूरा ही रहता है। ये लोग प्रकृति सौन्दर्य की पूजा करने के साथ-साथ जीती जागती प्रतिमाओं तथा स्थिर मूर्तियों की उपानसा भी समान रूप से करते हैं। यदि इनका विवाह या प्रेम सम्बन्ध २४ वर्ष की अवस्था तक न हो पाया तो ये लोग चरित्रहीन हो जाते हैं । 

यूं तो इससे पहले भी इनके गुप्त प्रेम की किवदन्तियाँ प्रसारित हो जाती हैं। ये लोग नशापान या धूम्रपान करने के आदी होते हैं। चाहे कुछ भी हो किन्तु इनका भाग्योदय या बुद्धि का विकास विवाह के पश्चात् या किसी सुन्दर स्त्री से प्रेम सम्बन्ध होने के पश्चात् ही होता है । ये लेख भारत के प्रसिद्ध हस्तरेखा शास्त्री नितिन कुमार पामिस्ट द्वारा लिखा गया है अगर आप उनके दवारा लिखे सभी लेख पढ़ना चाहते है तो गूगल पर इंडियन पाम रीडिंग ब्लॉग को सर्च करें और उनके ब्लॉग पर जा कर उनके लिखे लेख पढ़ें । यदि इन मनुष्यों के हाथ में जल यात्रा का यथेष्ट लक्षण न भी हो तो भी ये सुदूर समुद्र यात्रा में समर्थ हो जाते हैं। 

इनकी बुद्धि का विकास चन्द्रमा की कलाओं के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है और जल में चन्द्र-प्रतिबिम्ब के समान इनका स्वभाव चंचल, कामासक्त, तथा विषय वासनाओं से पूर्ण होता है। ये लोग अपने कोमल प्रकृति के कारण अपने मित्र की संख्या अतिशीघ्र ही बढ़ा लेते हैं। 

इनका मन, इनकी आँखों में होता है जो कि स्त्री प्रेमासक्त की ओर नित्यप्रति नवीनता को ढूढ़ता रहता हैं । ऐसे व्यक्ति समाज बन्धनों, रुढीवादों, वंशपरम्परा तथा कुल की मर्यादादि की कुछ भी परवाह न करके अर्थात् सभी बन्धनों को तोड़कर, शत प्रति शत तो नहीं किन्तु ९० प्रतिशत मनुष्य अवश्य ही, विधर्मी, विजाति, 'विदेशी लड़की से प्रेम विवाह करना पसन्द ही नहीं करते बल्कि प्रेम विवाह (Love Marriage) करते ही हैं। इसके लिए शुक्र क्षेत्र का उठा होना और गुरु क्षेत्र का दबा होना अति आवश्यक होता है । कुछ लोग दूसरे क्षेत्रों के शुभ होने पर-परस्त्री प्रेम में रत रहते हैं किन्तु प्रेम विवाह करने में सफल नहीं हो पाते । कुछ लोग केवल मन बहलावे के लिए ही परस्त्री प्रेम रत रहते हैं । 

यदि वह चन्द्र स्थान से आने वाली हृदय रेखा पर सहसा ठहर जाती है तो निश्चय ही ऐसे मनुष्य के उन्नति पथ में किसी को प्रेम बाधक रहेगा और उसे प्रेम व्यवहार में पूर्ण निराशा रहेगी । उसका जीवन देखने में गम्भीर और उदासीन दृष्टिगोचर होगा किन्तु वास्तव में पूर्ण रूप से अशान्त तथा व्याकुल ही होगा । 

ऐसे लोग हृदय प्रधान होते हैं जोकि भूत भविष्य की सोचे बिना ही मनचाही कर बैठते हैं और कार्य के प्रतिकूल होने पर (बिगड़ जाने पर) मन ही मन पछताते हैं, रोते और चिल्लाते हैं और जन साधारण की दृष्टि में उपहास का पात्र बने, बिना नहीं रहते और जब यह भाग्य रेखा अचानक मस्तक रेखा पर ठहर जाती है तो मनुष्य के प्रेम पथ में उसका स्वयं मस्तिष्क ही बाधक होता है। वह अवसर के प्राप्त होने तक यह निर्णय नहीं कर पाता कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए किम्कर्तव्यविमूढ़ की भाँति जड़वत बैठा रहता है और उन्मादादि या पागल की भाँति चेष्टा करता रहता है। एकाकी जीवन व्यतीत करता है। अकेला ही बैठा-बैठा घंटों अपने आप से बातें करता रहता है। 

कुछ लोग उसे दया पात्र समझते हैं तो कुछ उपहास करते हैं। उनका जीवन भी दुखी रहता है। इस रेखा का लहरदार होना उसके प्रेम पथ को उलझनों का द्योतक है । द्वीप का होना उसके प्रेम में एक बड़े भारी बवन्डर का आना प्रदर्शित करता है। श्रृंखलाबद्ध या जंजीर के समान होना उसके जीवन मार्ग में आने वालो प्रेम समस्याओं के विफल मार्ग प्रदर्शन का प्रत्यक्ष द्योतक है। 

इस भाग्य रेखा का एक या दो स्थान पर टूटकर ऊपर को बढ़ते रहना, उन्नति में बाधा आने के बाद उन्नति करना और प्रेम सम्बन्ध के टूट जाने के बाद नवीन प्रेम का । होना प्रदर्शित करता है। यदि इन टूटे हुए भागों को कोई तीसरी रेखा उनके समानान्तर चलकर रिक्त स्थानों की पूर्ति कर रही हो तो उसकी उन्नति या प्रेम सम्बन्ध किसी दूसरे की सहायता या कारणों से स्थिर रह सकते हैं।

यदि किसी हाथ में मणिबन्ध से आने वाली भाग्य रेखा सीधी, साफ, सुन्दर, निर्दोष, स्पष्ट रूप से शनि क्षेत्र को जाती हो और कोई रेखा चन्द्र क्षेत्र से आकर उसमें शीर्ष रेखा के समीप ही मिलती या शीर्ष रेखा पर ही मिलती हो या भाग्य रेखा को स्पर्श कर या काटकर शीर्ष रेखा पर ही मिलती हो तो ऐसे लक्षणों से युक्त हाथ वाले मनुष्य को अत्यन्त शुभ फल प्रदान करती है।

जिसका वर्णन इस प्रकार से है-

प्रथम प्रकार की चन्द्र रेखा जोकि चन्द्र क्षेत्र से निकलकर मणिबंध से आने वाली भाग्य रेखा में विलीन होकर ऊपर को चढ़ती है और ये दोनों मिलकर गंगा-यमुना के समान त्रिवेणी रूप से एक होकर शनि क्षेत्र को जाती हैं । यह रेखा उस मनुष्य के, जिसके हाथ में होती है बहुत से गुणों को विकसित करती है। उसके स्वभाव को कोमल तथा निर्मल बनाती है। तथा उसे दयावान, धार्मिक, दानी, तपस्वी, विद्वान्, दार्शनिक कलाकार, दार्शनिक विशारद, चित्रकार, मूत बनाने वाला, संगीत प्रिय, कवि, स्पष्टवक्ता, वैज्ञानिक, आविष्कारक, अनुसन्धानकर्ता तथा ऐतिहासिक पुरातत्वविघान के लिये उद्योगी आदि-आदि बनाकर उसको यश, कीति, धन, सम्पति परिस्थिति के अनुसार प्रदान करती है। 

ऐसा मनुष्य यदि कुशाग्र बुद्धि न भी हो तो भी वह विद्या व्यसनी अवश्य होता है । वह हर समय किसी न किसी प्रकार के ज्ञान प्राप्त करने के लिये तत्पर रहता है और अपने से अधिक ज्ञान वालों का आदर सत्कार सदा ही करता रहता है। उसमें स्वाभिमान की मात्रा अधिक होती है फिर भी उसका जीवन परोपकार तथा दीन दुखियों की भलाई के लिये ही होता है। वह अपने जीवन को दूसरों की भलाई के लिये न्यौछावर कर देने में ही अपने जीवन की सार्थकता मानता है और अपनी बात को निभाने के लिये असम्भव कार्यों को करने की सामर्थ दिखाता है और कभी-कभी अपनी शक्ति 'सामर्थ से कहीं अधिक कार्य कर बैठता है, दान दे बैठता है। 

वह विद्यानरोगी होने के साथ-साथ, शास्त्रारागी भी होता है। इन दोनों रेखाओ को एक साथ मिलकर ऊपर को चढ़ना यह बतलाता है कि उसकी कलाकृतियाँ, विद्वता या और अनेक गुण उसके भाग्यानुसार ही आगे को बढ़ रहे हैं और उसका भाग्य उसके गुणों का साथ निबाह रहा है। इसीलिये उसके भाग्य और कार्यों का घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है जो कि एक दूसरे की सहायता पाकर उत्तरोत्तर विकास को प्राप्त होता है। उसका जीवन सुखमय व्यतीत होता है। समाज के लिये ऐसे व्यक्ति बहुत ही हितकर होते हैं । 

ये लोग पूर्ण रूप से स्वतन्त्र प्रकृति के होते हैं और अपने स्वतन्त्र विचारों को स्थिर रखने के लिये किसी घनिष्ठ प्रेमी या सम्बन्धी का भी आश्रय स्वीकार नहीं करते जिसके लिये आजन्म अविवाहित रहना पसन्द करते हैं। बन्धनयुक्त प्रेम सम्बन्ध भी नहीं रखते और बन्धनमुक्त प्रेम सम्बन्ध में पुर्ण आस्था रखते हैं फिर भी यदि उनकी स्वतन्त्रता में अड़चन आती है तो अपवाद के भय से अपनी वर्षों की मित्रता को तिनके की तरह तजकर क्षणभर में अपना सम्बन्ध समाप्त कर देते हैं। इसके अतिरिक्त और भी बहुत सी विशेषताएँ ऐसे मनुष्यों के जीवन में पाई जाती हैं जोकि पाठक अपने अनुभव जन्मजात ज्ञान से यथा-समय प्राप्त कर सकते हैं।

दूसरे प्रकार की भाग्य रेखा वह होती है जो कि चन्द्र रेखा से चलकर भाग्य रेखा के समीप से होती हुई या उसे स्पर्श करती हुई मस्तक रेखा पर ठहर जाती है। इस प्रकार की ये दोनों रेखाएँ एक दूसरे का साथ बहुत काल तक निभाती रहती है किन्तु अचानक मस्तक रेखा पर इस रेखा का रुक जाना यह प्रदर्शित करता है कि वह मनुष्य जिसके हाथ में ये रेखाएँ हैं अपने पूर्वोक्त गुणों को तब तक सकुशल विकसित करता रहेगा जब तक उसकी अवस्था ३६ वर्ष की नहीं हो जाती । 

तत्पश्चात् उसके मस्तिष्क की किसी न्यूनता के कारण उसका गुण विकास शिथिल हो जायगा और वह अपने गुणों के कारण अभिवृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकेगा फिर भी यदि उसको भाग्य रेखा बिना अवरोध यदि शनि क्षेत्र को जाती होगी तो उसके भाग्य में किसी प्रकार की कमी नहीं आयेगी यदि ये दोनों ही रेखाये शीष रेखा पर रूक गई हैं तो निश्चय ही ३६ वर्ष में भाग्यास्त हो जायेगा। 

तीसरे प्रकार की चन्द्र-भाग्य रेखा वह होती है जो कि भाग्य रेखा को काटकर सीधी शनि क्षेत्र को चली जाती है या फिर मस्तक रेखा पर ठहर जाती है। जो रेखा भाग्य रेखा को काटकर शनि क्षेत्र को जाती है वह बतलाती है कि इस मनुष्य के गुण भाग्य को धक्का देकर आगे बढ़ रहे हैं। और दोनों ही गुण तथा भाग्य स्वतन्त्र रूप से अलग-अलग भाग्य को बनाने वाले हैं जो कि उस धक्के के पश्चात सदा उसकी उन्नति ही करती रहेंगी और दूसरी चन्द्र रेखा जोकि भाग्य रेखा को काटकर मस्तक रेखा पर ठहर जाती है यह बतलाती है कि उस धक्के के पश्चात् अपनी ही बुद्धि की भूल के कारण गुणों की वृद्धि ठहर जायगी और ह्रास हो जायगा और वह मनुष्य जीवन में ३६ वर्ष के बाद कोई विशेष उन्नति नहीं कर सकेगा।

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हस्तरेखा शास्त्र में 9वी तरह की भाग्य रेखा | Bhagya Rekha Jyotish Hast Rekha Shastra

हस्तरेखा शास्त्र में 8वी तरह की भाग्य रेखा | Bhagya Rekha Jyotish Hast Rekha Shastra

ज्योतिष शास्त्र में हाथ में दस प्रकार की भाग्य रेखा का विवरण | 10 Types Of Fate Line On Hand Palmistry

भाग्य रेखा की सीरीज में हम इस पोस्ट में अष्टम प्रकार की भाग्य रेखा की बात करेंगे। आप बाकी की 1 से 10 तक की भाग्य रेखा का विवरण और उनका आपस में सम्बन्ध यहाँ पढ़ सकते है " हस्तरेखा " ।

 हस्तरेखा शास्त्र में 8 वी तरह की भाग्य रेखा | भाग्य रेखा ज्योतिष हस्त रेखा शास्त्र
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हस्तरेखा शास्त्र में 8 वी तरह की भाग्य रेखा | भाग्य रेखा ज्योतिष हस्त रेखा शास्त्र 


अष्टम भाग्य रेखाः--अष्टम प्रकार की भाग्य रेखा वह कहलाती है जो कि नेपच्यून (वरुण) क्षेत्र से आरम्भ होकर (चित्र देखे १) मस्तक रेखा को पार करती हुई हृदय रेखा से निकलकर शनि प्रदेश में प्रविष्ट होती है । अधिकतर इस प्रकार की भाग्य रेखा सहायक भाग्य रेखा के रूप में ही पाई जाती है किन्तु किसी-किसी हाथ में स्वतन्त्र भाग्य रेखा के रूप में भी पाई जाती है।

जिन मनुष्यों के हाय में यह रेखा सुन्दर, साफ, स्पष्ट, गहरी और पतली होकर अपने स्वाभाविक रूप से शनि क्षेत्र पर ठहर जाती है उन मनुष्यों के लिए यह रेखा उनके विद्यार्थी जीवन में अत्यन्त शुभफल प्रदान करती है। ऐसे विद्यार्थी बाल्यकाल में सुस्त तथा उदासीन से रहते हैं फिर भी उनकी कुशाग्रबुद्धि का प्रमाण यदा कदा प्राप्त होता ही रहता है। ऐसे लक्षणों से युक्त मनुष्य अपनी असाधारण प्रतिभा को, अपने माता, पिता तथा इष्ट-मित्र-सम्बन्धियों की साधारण बुद्धि के समझ में न आने के कारण, एक समय तक पूर्ण रूप से विकसित नहीं कर पाते क्योंकि उनके सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति उनके वास्तविक रूप को न समझकर अपनीअपनी अभिरूचि के अनुसार चलाना चाहते हैं और ऐसे मनुष्य स्वतन्त्र प्रकृति के होने के कारण किसी दूसरे मार्ग पर ही चलना चाहते हैं । 

इसलिए आपसी मनमुटाव, वैमनस्य के रूप में पलटता जाता है जिस कारण उनकी पढ़ाई पूर्ण रूप से विद्यार्थी जीवन में नहीं हो पाती, जिसकी पूति वे अपनी स्वतन्त्र प्रकृति के अनुसार अवकाश पाते ही पूर्ण कर लेते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि जो मनुष्य अपने प्रारम्भिक जीवन में पूर्ण विद्याध्ययन में सफल नहीं हो पाता वह अपनी अध्ययन परिपाटि को अपनी वृद्धावस्था तक पूर्ण कर सुयश प्राप्त कर लेता है। ये लेख भारत के प्रसिद्ध हस्तरेखा शास्त्री नितिन कुमार पामिस्ट द्वारा लिखा गया है अगर आप उनके दवारा लिखे सभी लेख पढ़ना चाहते है तो गूगल पर इंडियन पाम रीडिंग ब्लॉग को सर्च करें और उनके ब्लॉग पर जा कर उनके लिखे लेख पढ़ें ।  ऐसा मनुष्य अच्छा लेखक, सुवक्ता अच्छा दाशिनिक, कलाकार, चित्रकार गायनवाद्य प्रवीण, प्रतिष्ठावान मनुष्य बन जाता है ।

यद्यपि उसको अपने विद्यार्थी जीवन में अनुतीर्ण होकर या घरेलू परिस्थिति के वशीभूत होकर कभी-कभी अपनी पढ़ाई को छोड़ना भी पड़ता है फिर भी वह अपने पुरुषार्थ तथा परायणता के कारण अपनी बुद्धि का विकास किए बिना नहीं रह सकता ऐसा मनुष्य अपने प्रारम्भिक जीवन में स्वजन समुदाय का कृपापात्र रहता है । उसका गार्हस्थ्य जीवन सुखमय होते हुए भी घनतृषित होता है। 

उसके मित्रों की संख्या अधिक होती है जोकि समय-समय पर उसकी सहायता कर हाथ बटाते रहते हैं और वह भी उनकी कृपा का सदा-सदा के लिए स्नेहभाजन रहता है। ऐसे लक्षणों से युक्त मनुष्य को विदेश यात्रा का सुअवसर दूसरी रेखाओं के सहयोग से प्राप्त हो सकता है। यदि यह रेखा लहरदार हो तो मनुष्य के भाग्योदय में भी लहरदार रुकावट आती रहती हैं। ये लेख भारत के प्रसिद्ध हस्तरेखा शास्त्री नितिन कुमार पामिस्ट द्वारा लिखा गया है अगर आप उनके दवारा लिखे सभी लेख पढ़ना चाहते है तो गूगल पर इंडियन पाम रीडिंग ब्लॉग को सर्च करें और उनके ब्लॉग पर जा कर उनके लिखे लेख पढ़ें ।  द्वीपदार रेखा के होने पर मनुष्य के उत्तरोनर बढ़ते हुए उत्कर्ष में अचानक अड़चन आ जाती हैं।

टूट-टूटकर बढ़ने वाली रेखा प्रदर्शित करती है कि इस मनुष्य के जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव के पश्चात् उन्नति होगी, इस रेखा के शृंखलाबद्ध होने पर उस मनुष्य के भाग्योन्नति में एक श्रृंखला जैसी कठिन स्थित का सामना करके आगे बढ़ना होता है । निर्दोष सर्प जिह्वाकर होने से मनुष्य दुतरफा प्रगति समान रूप से कर सकता है।

जिस मनुष्य की वृद्धावस्था सुखमय हो जाए तो समझना चाहिए कि उस मनुष्य ने पूर्व जन्म में बड़े ही शुभ कर्म किए हैं क्योंकि बाल्यावस्था की पीड़ा और कष्ट मनुष्य अपने यौवनावस्था के सुख में सभी भुला देता है और मध्यमावस्था के क्लेश वृद्धावस्था के सुखमय जीवन के सामने दब जाते हैं किन्तु वृद्धावस्था मरणपर्यन्त दुखदाई रहती है। जिसको मृत्यु भी सुखदायक अनुभव नहीं होती। 

जिसकी अन्तिमावस्था सुखदायक होती है, वास्तव में वही सुखी होता है। शरीर अवयवों के थक जाने पर मनुष्य में क्रोध बढ़ जाता है मन्दाग्नि होने पर भोजन सुपच नहीं होता, मन्द दृष्टि पड़ जाने पर दिखाई नहीं देता, कर्ण श्रवण शक्ति से हीन हो जाते हैं। इसलिए मानव की वृद्धावस्था सबसे दुखदाई होती है । जिस मनुष्य की यह अष्टम भाग्य रेखा भी शुभ फलदायक हो उसका जीवन भी धन्य तथा सुफल ही समझना चाहिए ।

हस्तरेखा शास्त्र में 8 वी तरह की भाग्य रेखा | भाग्य रेखा ज्योतिष हस्त रेखा शास्त्र 

हस्त ज्योतिष में हृदय रेखा (दिल की रेखा) का उंगलियों की तरफ झुकाव | Heart Line Towards Fingers Palmistry

हस्त ज्योतिष में हृदय रेखा (दिल की रेखा) का उंगलियों की तरफ झुकाव | Heart Line Towards Fingers

Jealous & Sensual Person - Indian Palmistry, हस्त ज्योतिष में हृदय रेखा (दिल की रेखा) का उंगलियों की तरफ झुकाव | Heart Line Towards Fingers Palmistry


कामुकता और ईर्ष्या का संकेत 

यदि दिल की रेखा बहुत ऊंची (उंगलियों की ओर या अंगुलियों के करीब) हो तो ईर्ष्या और कामुकता दर्शाती है। 

यदि उंगलियों और दिल की रेखा (हृदय रेखा) के बीच काफी अंतर है तो व्यक्ति खुले दिल का होता है।  

यदि दिल की रेखा छोटी है तो इंसान भावनाहीन है। 

यदि दिल की रेखा लंबी है तो व्यक्ति भावनात्मक होता है और यदि दिल की रेखा मस्तक रेखा की तरफ झुकती है तो व्यक्ति दिल की बजाय मस्तिष्क का निर्णय लेता है। 

अगर सिर की रेखा मुड़ कर हृदय रेखा की तरफ की तरफ बढ़ती है तो व्यक्ति मस्तिष्क की तुलना में हृदय से निर्णय लेता है। 

Read This Same Post In English - Heart Line Towards Fingers Palm Reading

अगर दिल की रेखा शनि पर्वत (सैटर्न माउंट) के अंत में समाप्त होती है तो व्यक्ति अंतर्मुखी और कामुक होता है। 

अगर दिल की रेखा (नीचे या ऊपर की ओर) की शाखा भाग्य रेखा या सूरज की रेखा को तोड़ देती है तो यह भावनात्मक झटका, विपक्ष के कारण वित्तीय नुकसान को इंगित करता है। दुश्मन , और अपोजिट सेक्स के कारण प्रतिष्ठा का नुकसान लिंग, आदि।

ज्योतिष में हाथ में अंधे होने का योग | Hast Jyotish

ज्योतिष में हाथ में अंधे होने का योग | Hast Jyotish 
sign of blindness in palmistry ज्योतिष में हाथ में अंधे होने का योग | Hast Jyotish

हथेली पर इतने सारे लक्षण होते हैं जो की आंखों की बीमारी और अंधापन को दर्शाता है।

जैसा कि आप जानते हैं कि ग्रह सूर्य ज्योतिष में आंखों की बीमारी के लिए जिम्मेदार है, वही चीज हथेली (हस्तरेखा ) में भी होती है, सूर्य पर्वत यानि सूर्य का माउंट ही आंखों की बीमारी के लिए जिम्मेदार होता है। 

यदि सूर्य के माउंट या सूर्य रेखा पर कोई बुरा संकेत या चिन्ह है, तो आँख से संबंधित विकार, दोष या परेशानी की संभावनाएं हमेशा होती हैं। 

सूर्य रेखा पर द्वीप आंखों की बीमारी का एक सामान्य संकेत है। भारतीय हस्तरेखा में, यदि बाएं हाथ पर मौजूद बुरा संकेत या चिन्ह मौजूद है तो सीधे हाथ की आँख से सम्बंधित बीमारी की संभावनाएं हैं, लेकिन यदि दायां हाथ पर बुरा चिन्ह मौजूद है तो बाएं आंख के  रोग की संभावनाएं हैं। 

मस्तक रेखा (हेडलाइन) आंख की कमजोरी, कमजोर दृष्टि, आँख पर चोट और अंधापन आदि के लिए भी जिम्मेदार है। यदि शीर्ष रेखा (मस्तक रेखा) देर से शुरू होती है, तो हमेशा आँख की समस्या या देर से परिपक्वता (समझदारी) आने की संभावना रहती है अगर कोई द्वीप या क्रॉस मस्तक रेखा पर है तो सिर की चोट या आंखों की चोट की संभावनाएं हमेशा रहती हैं। 

Read Same Post In English- Sign Of Blind On Hand Palmistry

हाथ में अंधयोग

1. चतुर्भुज में मौजूद वृत (सर्कल) 

2. सूर्य के पर्वत के नीचे मस्तक रेखा पर (हेड लाइन) पर ब्रेक / सर्कल / काला तिल (ब्लैक स्पॉट) होना  

3. जीवन रेखा (लाइफ लाइन) पर दो सर्कल होना अंधत्व का योग बनता है  

4. जीवन रेखा (लाइफ लाइन) पर एक सर्कल होना एक आँख से रौशनी का जाना 

5. स्टार सूर्य पर्वत के नीचे हार्ट लाइन पर  अंध योग बनता है  

6. सूर्य के माउंट के नीचे हार्ट लाइन पर ब्रेक / सर्कल / ब्लैक स्पॉट भी अंध योग बनता है 

ज्योतिष में हाथ में अंधे होने का योग | Hast Jyotish 

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